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Sanskar Vidhi-Mandanam (Hindi–Sanskrit) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Sanskarvidhi Commentary

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संस्कारविधि-मण्डनम् (Sanskar Vidhi-Mandanam), व्याकरणाचार्य पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह 104 पृष्ठीय Hindi-Sanskrit द्वि-भाषी ग्रंथ, महर्षि दयानन्द सरस्वती की प्रसिद्ध कृति ‘संस्कारविधि’ का एक scholarly विस्तार एवं व्याख्या-आभूषण (मण्डन) प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति संस्कार-व्यवस्था के advanced अध्येताओं के लिए एक valuable supplementary scholarly resource है।

‘मण्डनम्’ — ‘आभूषण अथवा अलंकरण’ — यह शीर्षक इंगित करता है कि यह ग्रंथ महर्षि की मूल संस्कारविधि को अतिरिक्त scholarly detail, clarification, तथा व्याख्या से ‘अलंकृत’ अथवा समृद्ध करता है, जिससे उसकी पूर्ण गहराई एवं व्यावहारिकता उजागर होती है।

महर्षि दयानन्द की ‘संस्कारविधि’ षोडश-संस्कारों (गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक) का foundational vedic-authentic विधान प्रस्तुत करती है। किन्तु इसकी संक्षिप्त, सूत्रात्मक शैली के कारण, अनेक स्थानों पर अतिरिक्त scholarly explanation की आवश्यकता महसूस होती है — यही आवश्यकता पंडित मीमांसक का यह ‘मण्डनम्’ पूरी करता है।

ग्रंथ के प्रत्येक अध्याय में महर्षि द्वारा वर्णित एक-एक संस्कार का विस्तृत scholarly विवेचन है — उसका shastric आधार, उसका ऐतिहासिक context, उसका आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक rationale, तथा आधुनिक काल में उसका practical अनुपालन।

**गर्भाधान-पुंसवन-सीमन्तोन्नयन** — गर्भावस्था-सम्बन्धी प्रारम्भिक संस्कारों का scholarly विवेचन, जो गर्भस्थ शिशु के स्वस्थ विकास एवं माता के कल्याण हेतु designed हैं।

**जातकर्म-नामकरण-निष्क्रमण-अन्नप्राशन** — जन्म-पश्चात् के प्रारम्भिक संस्कारों का विवेचन — कैसे यह संस्कार शिशु के शारीरिक-मानसिक विकास से जुड़े हैं।

**चूडाकर्म-कर्णवेध-उपनयन-वेदारम्भ** — बाल्यकाल एवं शिक्षा-आरम्भ से सम्बन्धित संस्कारों का detailed विवेचन, विशेष रूप से उपनयन का गहन दार्शनिक-सामाजिक महत्त्व।

**समावर्तन-विवाह** — शिक्षा-समापन एवं गृहस्थ-जीवन-आरम्भ से सम्बन्धित संस्कारों का comprehensive exposition।

**वानप्रस्थ-संन्यास-अन्त्येष्टि** — जीवन के उत्तरार्ध एवं अंतिम संस्कारों का scholarly विवेचन।

पंडित मीमांसक ने प्रत्येक संस्कार के लिए अतिरिक्त shastric evidence, comparative references (अन्य गृह्य-सूत्रों के साथ), तथा contemporary applicability पर विशेष scholarly बल दिया है, जो मूल संस्कारविधि की तुलना में अधिक comprehensive treatment प्रस्तुत करता है।

**Practical clarifications** — कुछ ऐसे स्थान जहाँ मूल संस्कारविधि के निर्देश आधुनिक पाठक के लिए अस्पष्ट हो सकते हैं, वहाँ पंडित मीमांसक ने detailed step-by-step clarification प्रदान की है, जो इस ग्रंथ को केवल एक scholarly commentary से आगे एक practical implementation-guide भी बनाता है।

104 पृष्ठीय comprehensive आयाम विषय की depth के अनुरूप है।

आर्य समाज के साधकों, संस्कार-व्यवस्था के गहन अध्येताओं, purohitों, संस्कारविधि के गम्भीर पाठकों, वैदिक gurukulas के acharyas, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो महर्षि दयानन्द की संस्कारविधि को उसकी पूर्ण scholarly गहराई में समझना चाहता है — संस्कारविधि-मण्डनम् एक मूल्यवान supplementary scholarly संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के समापन में यह भी scholarly आग्रह किया है कि संस्कार-व्यवस्था का पुनरुद्धार केवल ritual-performance तक सीमित नहीं रहना चाहिए, अपितु इसके पीछे के गहन शैक्षणिक एवं नैतिक उद्देश्यों की समझ के साथ conducted होना चाहिए। प्रत्येक संस्कार का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है जब यजमान एवं परिवार उसके symbolic एवं व्यावहारिक महत्त्व को हृदयंगम करते हैं, न कि केवल यांत्रिक रूप से अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं — यह गहन scholarly-cum-spiritual insight ग्रंथ का एक विशेष योगदान है। यही गहनता इस ग्रंथ को मूल संस्कारविधि के एक अनिवार्य एवं मूल्यवान साथी-ग्रंथ के रूप में स्थापित करती है। यह ग्रंथ इस प्रकार theory एवं व्यवहार के बीच एक सुदृढ़ सेतु का निर्माण करता है।

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