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Dhatupathah (Sanskrit) – by Maharshi Panini | Ashtadhyayi Verbal Roots Compendium

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धातुपाठ (Dhatupathah), महर्षि पाणिनि के अष्टाध्यायी का अभिन्न अंग — यह 100 पृष्ठीय संस्कृत ग्रंथ संस्कृत व्याकरण-शास्त्र की आधारशिला है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति पाणिनीय परम्परा के मूल धातु-संग्रह को scholarly authenticity के साथ प्रस्तुत करती है — जिसका अध्ययन संस्कृत व्याकरण के प्रत्येक गम्भीर विद्यार्थी के लिए अपरिहार्य है।

‘धातुपाठ’ का शब्दार्थ है — धातुओं का पाठ अथवा संग्रह। संस्कृत भाषा की संरचना में ‘धातु’ (root) मूल इकाई है, जिससे क्रिया-पद, कृदन्त, तद्धित, समास — समस्त शब्द-राशि की उत्पत्ति होती है। महर्षि पाणिनि ने अपने व्याकरण-तंत्र की रचना के समय एक systematic धातु-कोश संकलित किया, जिसे ‘पाणिनीय धातुपाठ’ कहा जाता है। यह संग्रह दश गणों में विभक्त है — भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्रयादि एवं चुरादि — कुल लगभग 1944 धातुओं का scholarly वर्गीकरण।

प्रथम गण ‘भ्वादि’ सर्वाधिक विशाल एवं प्रसिद्ध है, जिसमें ‘भू’ (होना), ‘पठ्’ (पढ़ना), ‘गम्’ (जाना), ‘दा’ (देना) — जैसे common धातु संगृहीत हैं। द्वितीय ‘अदादि’ गण में ‘अद्’ (खाना), ‘अस्’ (होना), ‘इ’ (जाना) — जैसे important धातु आते हैं। तृतीय ‘जुहोत्यादि’ में द्विरुक्ति-प्रधान धातु — ‘हु’ (हवन करना), ‘दा’ (देना), ‘धा’ (धारण करना)। चतुर्थ ‘दिवादि’ में ‘दिव्’ (खेलना), ‘पुष्’ (पुष्टि), ‘नश्’ (नष्ट होना) — आदि।

प्रत्येक धातु के साथ उसका अर्थ, गण-निर्देश, परस्मैपद-आत्मनेपद-उभयपद का संकेत, सेट्-अनिट्-वेट् का चिह्नांकन, तथा विशिष्ट प्रयोग-नियम — इन सब का systematic विवरण है। यह comprehensive structure धातुपाठ को एक scholarly reference manual बनाती है, जिसके बिना संस्कृत व्याकरण का अध्ययन अधूरा रह जाता है।

संस्कृत क्रिया-निर्माण की प्रक्रिया धातुपाठ के बिना समझी ही नहीं जा सकती। ‘पठ्’ धातु से ‘पठति, पठतः, पठन्ति’ — यह तिङन्त रूप कैसे बनते हैं; ‘भू’ से ‘भवति, बभूव, भविष्यति’ — यह काल-भेद कैसे प्रकट होता है; ‘कृ’ से ‘करोति, चकार, करिष्यति, क्रियते’ — यह समस्त lakar-prakriya धातु-गण के अनुसार कैसे विभेदित होती है — इन सब प्रश्नों का समाधान धातुपाठ के अध्ययन से ही प्राप्त होता है।

ऐतिहासिक रूप से धातुपाठ की scholarly महत्ता विश्वव्यापी है। पाणिनि के बाद कात्यायन ने वार्तिकों में, पतंजलि ने महाभाष्य में, क्षीरस्वामी ने ‘क्षीरतरंगिणी’ में, मैत्रेयरक्षित ने ‘धातुप्रदीप’ में, सायण ने ‘माधवीय धातुवृत्ति’ में — सभी ने धातुपाठ की scholarly व्याख्या प्रस्तुत की है। आधुनिक काल में पाश्चात्य Indologists — Whitney, Liebich, Cardona — ने भी इसकी scientific संरचना का अध्ययन किया है।

विद्याध्ययन के क्रम में धातुपाठ को कण्ठस्थ करना संस्कृत-गुरुकुलों की पारम्परिक पद्धति रही है। बिना धातुपाठ के स्मरण के, संस्कृत के तिङन्त-रूपों की निर्माण-प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती; बिना तिङन्त-निर्माण के, संस्कृत वाक्य-रचना सम्भव नहीं; बिना वाक्य-रचना के, समस्त संस्कृत वाङ्मय अपठित रह जाता है। अतः धातुपाठ संस्कृताध्ययन की प्रवेश-वेदी है।

प्रकाशित संस्करण की scholarly गुणवत्ता ध्यातव्य है। मूल पाणिनीय धातुपाठ का संस्कृत में authentic प्रस्तुतीकरण, devanagari लिपि में स्पष्ट मुद्रण, गण-वार व्यवस्थित संगठन — यह सब शास्त्रीय परम्परा के अनुरूप है। 100 पृष्ठीय compact आकार ग्रंथ को दैनिक स्वाध्याय एवं कक्षा-अध्यापन — दोनों के लिए सुगम बनाता है।

रामलाल कपूर ट्रस्ट का प्रकाशन-कार्य संस्कृत-प्राच्य विद्या के संरक्षण में एक civilisational भूमिका निभा रहा है। ट्रस्ट के माध्यम से प्रकाशित यह धातुपाठ scholarly authenticity एवं शास्त्रीय गरिमा का संगम है।

संस्कृत के विद्यार्थियों, व्याकरण-शास्त्र के researchers, गुरुकुलीय शिक्षकों, संस्कृत shastri-acharya परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों, पाणिनीय परम्परा के साधकों, संस्कृत-वेद-शास्त्र के pandit-गणों, एवं प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो संस्कृत व्याकरण की नींव पर खड़ी विशाल वाङ्मय-शिखर तक पहुँचना चाहता है — धातुपाठ अनिवार्य ग्रंथ है।

यह कृति केवल पुस्तक नहीं — यह सहस्राब्दियों की अखण्ड पाणिनीय परम्परा का एक मूर्त रूप है, जिसका प्रत्येक धातु-सूत्र संस्कृत भाषा की scientific संरचना का साक्षी है। महर्षि पाणिनि की systematic linguistic दृष्टि — जिसने आधुनिक भाषा-विज्ञान को भी प्रेरित किया है — का प्रत्यक्ष दर्शन यहाँ उपलब्ध है।

प्राच्य विद्या-संरक्षण की दिशा में यह संस्करण एक civilisational धरोहर है, जिसकी scholarly value समय के साथ निरन्तर बढ़ती जाती है। पाणिनीय परम्परा का प्रत्येक जिज्ञासु इसका अध्ययन कर अपनी संस्कृत-साधना को सुदृढ़ कर सकता है।

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