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Samarpan Se Samadhi Siddhi (Hindi) – by Swami Yoganand Saraswati | Ashtanga Yoga Sadhana

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समर्पण से समाधि सिद्धि (Samarpan Se Samadhi Siddhi), आदरणीय स्वामी योगानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 285 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, योग-साधना एवं आध्यात्मिक उन्नयन की एक systematic एवं प्रामाणिक मार्गदर्शिका है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति समर्पण-भाव से प्रारम्भ कर समाधि-सिद्धि तक की आध्यात्मिक यात्रा का scholarly किन्तु सरल-सुगम विवेचन प्रस्तुत करती है।

ग्रंथ का मूल प्रस्थान-बिन्दु ईश्वर-प्रणिधान है — महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का वह सर्वोच्च सिद्धान्त जिसमें कहा गया है ‘ईश्वर-प्रणिधानाद्वा’ (योगसूत्र 1.23) — समाधि की प्राप्ति केवल ईश्वर-समर्पण से भी सम्भव है। स्वामी योगानन्द सरस्वती ने इसी सूत्र को अपनी समस्त साधना-शिक्षा का आधार बनाया है। उनका यह दृढ़ मत है कि बिना सच्चे समर्पण के योग केवल physical exercise बनकर रह जाता है, उसकी आध्यात्मिक सिद्धि असम्भव है।

प्रथम खण्ड में लेखक ने ‘समर्पण’ का दार्शनिक स्वरूप उद्घाटित किया है। समर्पण क्या है? यह केवल आत्म-त्याग नहीं, अपितु आत्म-समर्पण है। अहंकार का गलन, ईश्वरीय इच्छा के प्रति पूर्ण स्वीकृति, कर्तृत्व-भाव का त्याग — ये समर्पण के विविध आयाम हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’, उपनिषदों के ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ — इन परम सूत्रों के आलोक में समर्पण का व्यापक विवेचन है।

अष्टांग योग का systematic अध्ययन ग्रंथ का central खण्ड है। पतंजलि के यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि — इन आठ अंगों का प्रामाणिक विवेचन प्रस्तुत है। प्रत्येक अंग का दार्शनिक आधार, व्यावहारिक अभ्यास-विधि, एवं सिद्धि के लक्षण — इन तीन परिप्रेक्ष्यों से प्रत्येक चरण को परीक्षित किया गया है।

यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) एवं नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान) के अध्याय विशेष रूप से व्यावहारिक हैं। आधुनिक गृहस्थ-साधक के लिए इन यम-नियमों का पालन कैसे सम्भव है, उनके व्यावहारिक applications क्या हैं, उनकी साधना में क्या-क्या बाधाएँ आती हैं — इन सब विषयों पर सहानुभूतिपूर्ण किन्तु शास्त्र-सम्मत मार्गदर्शन है।

आसन एवं प्राणायाम के अध्याय technically सूक्ष्म हैं। प्रमुख ध्यानात्मक आसन — पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन, सुखासन — का विवरण, उनकी विशेषताएँ, कौन-सा आसन किस साधक के लिए उपयुक्त है, यह स्पष्ट है। प्राणायाम के मूल भेद — पूरक-कुम्भक-रेचक, उज्जायी, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, कपालभाति, भस्त्रिका — इनकी प्रामाणिक तकनीक एवं उनके आध्यात्मिक प्रभाव — सब विवेचित हैं।

प्रत्याहार — इन्द्रियों का बाह्य विषयों से प्रत्यावर्तन — योग का सर्वाधिक उपेक्षित किन्तु निर्णायक चरण है। बहिर्मुख चित्त को अन्तर्मुख कैसे किया जाए, इसकी विधि-विधान का विस्तृत विवेचन है। धारणा (एकाग्रता) एवं ध्यान (एकाग्रता का प्रवाह) की सूक्ष्म technicalities पर भी गहन विचार है।

समाधि के विभिन्न स्तर — सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेद (सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार, निर्विचार), असम्प्रज्ञात समाधि, सबीज एवं निर्बीज समाधि, धर्ममेघ समाधि — इन सबका scholarly विवेचन ग्रंथ के दार्शनिक पराकाष्ठा का निर्माण करता है। सिद्धियों (विभूतियों) पर अध्याय यह स्पष्ट करता है कि साधना में आने वाली अष्ट-सिद्धियाँ साधना का परिणाम तो हैं, किन्तु लक्ष्य नहीं — वास्तविक लक्ष्य कैवल्य अथवा मोक्ष है।

ग्रंथ में एक विशेष व्यावहारिक अध्याय गृहस्थ-साधक के लिए समर्पित है। नौकरी-व्यवसाय, परिवार, सामाजिक उत्तरदायित्व — इन सबके बीच कैसे साधना का क्रम बनाए रखें, किन समय में क्या करें, किन सामान्य त्रुटियों से बचें — इन प्रश्नों के सहानुभूतिपूर्ण समाधान हैं।

स्वामीजी की एक उल्लेखनीय विशेषता है उनकी अनुभव-आधारित प्रस्तुति। ग्रंथ में अनेक स्थानों पर उनके स्वयं के साधना-अनुभव, उनके गुरु-परम्परा से प्राप्त निर्देश, एवं उनके शिष्यों के अनुभव — ये सब उद्धृत हैं, जो ग्रंथ को केवल पुस्तकीय ज्ञान से अधिक एक जीवन्त साधना-शिक्षा बनाते हैं।

ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें संस्कृत योग-शब्दावली का सटीक एवं संयमित प्रयोग है। प्रत्येक सिद्धान्त के समर्थन में पतंजलि योगसूत्र, हठयोग प्रदीपिका, घेरण्ड संहिता, उपनिषद् एवं भगवद्गीता के प्रामाणिक उद्धरण हैं।

योग-साधकों, ध्यान के अभ्यासियों, संन्यासियों, गृहस्थ साधकों, योग-शिक्षकों, एवं प्रत्येक उस आध्यात्मिक जिज्ञासु के लिए जो योग की आन्तरिक गहराई तक पहुँचना चाहता है — समर्पण से समाधि सिद्धि एक trustworthy मार्गदर्शक है। यह ग्रंथ इस सत्य का स्मरण है कि वास्तविक योग शरीर का व्यायाम नहीं — आत्मा का परमात्मा से अभेद-साक्षात्कार है।

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