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Samaj Darpan (Hindi) – by Dr. M.P. Jain | Indian Society Scholarly Review

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समाज दर्पण (Samaj Darpan), विद्वान् लेखक डॉ. एम. पी. जैन द्वारा रचित यह 275 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, समकालीन भारतीय समाज की एक scholarly एवं संवेदनशील समीक्षा है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति ‘समाज’ को एक दर्पण के समान प्रस्तुत करती है — जिसमें उसकी उपलब्धियाँ, उसकी विकृतियाँ, उसकी सम्भावनाएँ, एवं उसकी कमज़ोरियाँ — सभी spष्टता के साथ प्रतिबिम्बित होती हैं।

ग्रंथ का मूल प्रस्थान-बिन्दु यह है कि भारतीय समाज एक civilisational continuum है, जिसकी जड़ें वैदिक संस्कृति, दर्शन एवं नैतिक मूल्यों में गहरी हैं। किन्तु आज यह समाज एक civilisational crossroads पर खड़ा है — एक ओर अपनी प्राचीन धरोहर को संरक्षित रखने का दायित्व है, दूसरी ओर आधुनिकता, वैश्वीकरण एवं तकनीकी क्रांति के चुनौतियों का सामना है। डॉ. जैन ने इस complex संतुलन को scholarly objectivity एवं dharmic gravitas के साथ परीक्षित किया है।

प्रथम खण्ड में लेखक ने भारतीय सामाजिक संरचना के मूल तत्त्वों — वर्णाश्रम, परिवार-व्यवस्था, गोत्र-परम्परा, सम्प्रदाय-वैविध्य, क्षेत्रीय एवं भाषाई बहुलता — का scholarly विवेचन किया है। यह दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय समाज की मौलिक विशेषता उसकी ‘अनेकता में एकता’ है — जो किसी आयातित multiculturalism का परिणाम नहीं, अपितु सहस्राब्दियों की civilisational practice है।

संयुक्त परिवार-व्यवस्था का अध्याय विशेष रूप से प्रकाशमान है। पारम्परिक संयुक्त परिवार के लाभ — emotional security, बच्चों का संस्कार-निर्माण, वृद्धों की देखभाल, आर्थिक सहयोग — एवं उसके आधुनिक काल में अनिवार्य परिवर्तन का संतुलित विवेचन है। nuclear family की ओर सामाजिक प्रवृत्ति, urbanisation का प्रभाव, women’s empowerment के साथ family structure में परिवर्तन — इन सबको लेखक ने sympathetic किन्तु critical दृष्टि से देखा है।

जातिगत समस्या पर लेखक का दृष्टिकोण reformist एवं scholarly है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि वैदिक वर्ण-व्यवस्था (कर्म-गुण आधारित) तथा परवर्ती जाति-व्यवस्था (जन्म-आधारित) में मौलिक भेद है। समकालीन समाज में जातिगत भेदभाव की उपस्थिति, छुआछूत का अवशेष, आरक्षण-नीति की समीक्षा, एवं inclusive सामाजिक प्रगति के मार्ग — इन सब विषयों पर balanced चर्चा है।

स्त्री-समाज का अध्याय एक प्रमुख focus है। वैदिक काल में स्त्री की प्रतिष्ठित स्थिति, मध्यकाल में हुआ ह्रास, ब्रिटिश काल के सुधार, स्वतंत्र भारत में स्त्री-शिक्षा एवं empowerment की प्रगति, तथा वर्तमान काल की चुनौतियाँ — दहेज, घरेलू हिंसा, workplace harassment — इन सबका scholarly विवेचन है। साथ ही, traditional एवं modern मूल्यों के बीच एक dignified balance की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

युवा-वर्ग एवं उनकी समकालीन चुनौतियों पर एक विशेष खण्ड है। शिक्षा-प्रणाली में दोष, बेरोज़गारी की समस्या, mental health crises, पाश्चात्य सांस्कृतिक प्रभाव, social media का प्रभाव, drug abuse — इन गम्भीर समस्याओं की पहचान एवं उनके dharmic-cultural समाधान सुझाए गए हैं।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयाम पर भी विशेष विचार है। आधुनिक भारतीय समाज में बढ़ता secularism, सम्प्रदायों के बीच तनाव, धर्म एवं राजनीति का संश्लेषण, आध्यात्मिक पुनर्जागरण — इन सब विषयों पर scholarly किन्तु sympathetic विश्लेषण है। लेखक ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि भारत का धर्म-आधारित सामाजिक framework कोई backward तत्त्व नहीं — यह उसकी civilisational शक्ति का स्रोत है।

आर्थिक-सामाजिक आयाम पर भी अध्याय हैं। आर्थिक असमानता, ग्रामीण एवं शहरी विभाजन, कृषि-संकट, environment degradation, भौतिकवादी जीवन-शैली के सामाजिक परिणाम — इन सब विषयों पर लेखक ने अंतर्दृष्टिपूर्ण एवं समाधान-केन्द्रित विवेचन प्रस्तुत किया है।

राजनीतिक एवं नागरिक चेतना के अध्याय भी मूल्यवान हैं। लोकतंत्र की चुनौतियाँ, corruption, communalism, regionalism, राष्ट्रीय एकता का विषय, civic responsibility — इन पर विचार ग्रंथ की समकालीन प्रासंगिकता को सुरक्षित रखता है।

ग्रंथ की भाषा सहज, प्रांजल हिन्दी है, जो scholarly तथा accessible — दोनों है। प्रत्येक तर्क के समर्थन में evidence, statistics, historical references, एवं dharmic citations का सम्यक् उपयोग है। 275 पृष्ठीय यह कृति न तो असंभाव्य रूप से लम्बी है, न ही superficially संक्षिप्त — यह विषय की complexity के अनुरूप एक संतुलित scope प्रस्तुत करती है।

समाज-शास्त्र के विद्यार्थियों, समाज-सुधारकों, civil society के कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, पत्रकारों, नीति-निर्माताओं, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो भारतीय समाज को उसकी सम्पूर्ण complexity में समझना चाहता है — समाज दर्पण एक मूल्यवान संसाधन है। यह कृति एक मौन किन्तु दृढ़ आह्वान है — कि हम अपने समाज के दर्पण में स्वयं को देखें, अपनी कमज़ोरियों को स्वीकारें, अपनी शक्तियों को पहचानें, एवं एक बेहतर सामाजिक future की रचना में अपना योगदान दें।

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