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Rishi-Pranali (Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Vedic Sages Gotra System

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ऋषि-प्रणाली (Rishi-Pranali), पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह हिन्दी scholarly ग्रंथ, वैदिक ऋषि-परम्परा की systematic संरचना, उनकी वंश-परम्परा (गोत्र-प्रणाली), तथा उनकी ज्ञान-transmission-methodology का एक rigorous scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वैदिक ऋषि-प्रणाली के historical-sociological अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण scholarly resource है।

‘ऋषि-प्रणाली’ — ऋषियों की systematic वंश-परम्परा एवं ज्ञान-transmission-व्यवस्था — यह Vedic civilisation की एक foundational institutional संरचना है, जिसने सहस्राब्दियों तक वैदिक ज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार को सुनिश्चित किया।

पंडित मीमांसक ने अपने इस अध्ययन में ऋषि-परम्परा के विभिन्न आयामों का systematic scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है — प्रमुख ऋषि-कुल (गोत्र), उनकी वंश-परम्परा, तथा उनके specific वैदिक contributions।

**गोत्र-व्यवस्था का scholarly विवेचन** — भारद्वाज, वसिष्ठ, विश्वामित्र, कश्यप, अत्रि, गौतम, अगस्त्य, कण्व जैसे प्रमुख ऋषि-गोत्रों का historical-genealogical विश्लेषण, तथा कैसे यह गोत्र-व्यवस्था वैदिक सामाजिक संगठन का एक foundational element बनी।

**ऋषि-द्रष्टृत्व का concept** — यह scholarly स्पष्ट किया गया है कि ‘ऋषि’ मन्त्रों के ‘रचयिता’ नहीं, अपितु ‘द्रष्टा’ (seers) माने जाते हैं — यह concept वेदों की अपौरुषेयता के सिद्धान्त के साथ गहराई से जुड़ा है।

**ज्ञान-transmission-methodology** — गुरु-शिष्य-परम्परा के माध्यम से मौखिक ज्ञान-transmission की sophisticated प्रणाली, तथा कैसे यह oral tradition सहस्राब्दियों तक वेद-मन्त्रों की remarkable accuracy को सुनिश्चित करने में सफल रही।

**ऋषि-परिवारों का सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव** — प्राचीन वैदिक समाज में विभिन्न ऋषि-कुलों की भूमिका, उनका राजाओं के साथ सम्बन्ध, तथा उनका समाज-निर्माण में योगदान का scholarly विवेचन।

**स्त्री-ऋषिकाओं का उल्लेख** — गार्गी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, घोषा जैसी वैदिक विदुषी स्त्रियों का scholarly उल्लेख, जो वैदिक ज्ञान-परम्परा में स्त्रियों की भूमिका को रेखांकित करता है।

पंडित मीमांसक की rigorous, evidence-based scholarly methodology प्रत्येक दावे को shastric references एवं comparative textual evidence के साथ स्थापित करती है।

आर्य समाज के साधकों, वैदिक इतिहास के researchers, comparative religion के अध्येताओं, gotra-व्यवस्था में रुचि रखने वाले genealogy-researchers, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो वैदिक ऋषि-परम्परा की systematic संरचना को गहराई से समझना चाहता है — ऋषि-प्रणाली एक मूल्यवान scholarly संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के समापन में यह भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है कि कैसे यह प्राचीन ऋषि-प्रणाली आधुनिक academic-genealogy एवं oral-tradition-studies के लिए भी एक valuable case-study प्रस्तुत करती है, जो अन्य प्राचीन सभ्यताओं की ज्ञान-transmission-systems के साथ comparative अध्ययन के लिए भी उपयोगी है।

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