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Rishi Dayanand Saraswati Ka Swalikhit Atmacharit (Hindi) – by Maharshi Dayanand Saraswati | Original Autobiography

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ऋषि दयानन्द सरस्वती का स्वलिखित आत्मचरित (Rishi Dayanand Saraswati Ka Swalikhit Atmacharit), महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्वयं रचित यह हिन्दी ग्रंथ, आर्य समाज के संस्थापक की स्वयं की कलम से रचित एक अनुपम, primary-source आत्मकथा प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति महर्षि के जीवन-चरित्र का सर्वाधिक authentic एवं प्रत्यक्ष दस्तावेज़ है, जो किसी अन्य biographer के माध्यम से नहीं, अपितु स्वयं महर्षि के अपने शब्दों में उनकी जीवन-यात्रा प्रस्तुत करता है।

‘स्वलिखित आत्मचरित’ — ‘स्वयं द्वारा लिखित आत्मकथा’ — यह शीर्षक स्वयं इस दस्तावेज़ की अद्वितीय primary-source-value को रेखांकित करता है। जबकि अनेक biographers ने महर्षि के जीवन पर विस्तृत कृतियाँ रची हैं, यह ग्रंथ महर्षि के अपने first-person account को प्रस्तुत करता है, जो historians एवं devotees दोनों के लिए अमूल्य है।

महर्षि ने अपनी इस autobiography में अपने बाल्यकाल — काठियावाड़-टंकारा में जन्म, अम्बाशंकर तिवारी के परिवार में पालन-पोषण — का वर्णन किया है। शिवरात्रि-रात्रि का प्रसिद्ध ‘मूषक प्रसंग’, जिसने बालक मूलशंकर के मन में मूर्ति-पूजा के विरुद्ध मौलिक प्रश्न उत्पन्न किए, का स्वयं महर्षि द्वारा वर्णित प्रत्यक्ष विवरण।

**गृह-त्याग एवं संन्यास-यात्रा** — 22 वर्ष की आयु में गृह-त्याग का निर्णय, इसके पीछे के व्यक्तिगत-आध्यात्मिक कारण, तथा तत्पश्चात् अनेक वर्षों तक भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण एवं विभिन्न गुरुओं से शिक्षा-प्राप्ति का स्वयं-वर्णित विवरण।

**स्वामी विरजानन्द से शिक्षा** — मथुरा में स्वामी विरजानन्द के गुरुकुल में वैदिक-व्याकरण-शिक्षा-प्राप्ति का व्यक्तिगत अनुभव, तथा गुरु-दक्षिणा के प्रसिद्ध प्रसंग का प्रत्यक्ष वर्णन, जिसमें गुरु ने महर्षि से वैदिक धर्म के पुनर्जागरण का संकल्प माँगा।

**प्रचार-यात्राओं का व्यक्तिगत अनुभव** — भारत के विभिन्न भागों में उनकी यात्राओं, शास्त्रार्थों, तथा समाज-सुधार-कार्यों का first-person perspective से वर्णन, जो अन्य biographers की तुलना में एक अधिक intimate, प्रामाणिक झलक प्रदान करता है।

**व्यक्तिगत संघर्ष एवं चुनौतियों का वर्णन** — महर्षि ने अपनी आत्मकथा में केवल अपनी उपलब्धियों का ही नहीं, अपितु अपने संघर्षों, विरोधों, तथा personal challenges का भी ईमानदार वर्णन किया है, जो इस दस्तावेज़ को एक authentic, unvarnished personal account बनाता है।

यह ग्रंथ इतिहासकारों, आर्य समाज के साधकों, तथा प्रत्येक उस पाठक के लिए एक अमूल्य primary source है जो महर्षि के जीवन को उनकी अपनी आवाज़ में, बिना किसी intermediary interpretation के, प्रत्यक्ष रूप से जानना चाहता है।

आर्य समाज के साधकों, आधुनिक भारतीय इतिहास के researchers, biographical-primary-source-studies के अध्येताओं, धार्मिक सुधार-इतिहास के विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो महर्षि दयानन्द के जीवन को उनकी अपनी प्रामाणिक आवाज़ में जानना चाहता है — यह आत्मचरित एक अमूल्य एवं ऐतिहासिक रूप से अद्वितीय संसाधन है।

यह autobiography — यद्यपि अपेक्षाकृत संक्षिप्त एवं महर्षि के अत्यंत व्यस्त जीवन के कारण अधूरी — फिर भी उनके व्यक्तित्व, उनकी प्रेरणाओं, तथा उनकी civilisational vision की एक अद्वितीय, अपरिवर्तनीय झलक प्रदान करती है, जिसे कोई भी secondary biography पूर्णतः replicate नहीं कर सकती। यह दस्तावेज़ आर्य समाज साहित्य का एक कोहिनूर-सदृश रत्न है।

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