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Pandit Ramprasad Bismil Ki Atmakatha (Hindi) – by Ram Prasad Bismil | Freedom Martyr Autobiography

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पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (Pandit Ramprasad Bismil Ki Atmakatha), अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा स्वयं रचित यह 192 पृष्ठीय हिन्दी आत्मकथा, भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के साहित्य का एक अमूल्य रत्न है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति उस महान् क्रांतिकारी की लेखनी से प्रसूत है जिन्होंने अपने अंतिम क्षणों तक ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ का उद्घोष करते हुए मातृभूमि को अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

यह आत्मकथा एक साधारण जीवनवृत्तांत नहीं है — यह एक जागृत राष्ट्र-पुरुष का अंतःकरण-प्रकटीकरण है, जो उन्होंने गोरखपुर जेल की कोठरी में, फाँसी के तख्ते की प्रतीक्षा करते हुए, अल्प समय में लिखी थी। प्रत्येक पंक्ति में देशभक्ति की आँच, बलिदान का संकल्प, एवं ईश्वर-निष्ठा की दीप्ति प्रस्फुटित होती है। यह वह दुर्लभ साहित्य है जो साहित्य से अधिक एक आध्यात्मिक उद्बोधन बन जाता है।

बिस्मिल जी का जन्म 1897 में शाहजहाँपुर में एक साधारण परिवार में हुआ था। आत्मकथा के प्रारम्भिक अध्यायों में उन्होंने अपने बाल्यकाल, माता-पिता का प्रभाव, प्रारम्भिक शिक्षा, एवं उन परिस्थितियों का वर्णन किया है जिन्होंने उनके चरित्र-निर्माण में योगदान दिया। उनकी माता का धार्मिक प्रभाव, पिता की अनुशासनप्रियता, एवं स्वयं की अध्ययनशीलता — इन सबने उन्हें एक ऐसा युवक बनाया जो आगे चलकर इतिहास की एक अमर ज्योति बन गया।

आर्य समाज एवं स्वामी सोमदेव के साथ उनका सम्पर्क उनके वैचारिक विकास का एक निर्णायक मोड़ था। महर्षि दयानन्द सरस्वती के ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अध्ययन ने उनमें वैदिक धर्म, राष्ट्रवाद, एवं सामाजिक सुधार की चेतना जागृत की। उन्होंने कैसे एक साधारण विद्यार्थी से क्रमशः एक प्रखर देशभक्त, फिर एक संगठनकर्ता, एवं अन्ततः एक सशस्त्र क्रांतिकारी बनते गए — यह यात्रा अत्यंत प्रेरक एवं हृदय-स्पर्शी है।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना एवं उसके आदर्शों पर बिस्मिल जी ने विस्तार से लिखा है। 1925 का काकोरी काण्ड — जो भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का एक मील का पत्थर बना — का प्राथमिक विवरण आत्मकथा की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। काकोरी रेल पर ब्रिटिश खज़ाने को छीनने की उस साहसिक योजना का concept, planning, execution तथा aftermath — स्वयं नायक की लेखनी से जो विवरण प्राप्त होता है, वह किसी historian के अनुसन्धान से कहीं अधिक authentic एवं सजीव है।

गिरफ़्तारी, मुकदमा, जेल का जीवन — इन अध्यायों में बिस्मिल जी की scholarly दृष्टि एवं आध्यात्मिक स्थिरता दोनों प्रकट होती हैं। उन्होंने जेल को कारागार नहीं, अपितु तपोवन माना। वहाँ अपनी अध्ययनशीलता को बनाए रखा, साहित्य रचा, साथी क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ाया, एवं अपने उद्देश्य के प्रति अडिग बने रहे।

आत्मकथा का सर्वाधिक मार्मिक एवं प्रेरक खण्ड वह है जहाँ बिस्मिल जी अपने अंतिम दिनों का वर्णन करते हैं। फाँसी की प्रतीक्षा, माता-पिता को संबोधन, अपने बचपन की स्मृतियाँ, राष्ट्र को संदेश, ईश्वर के प्रति शरणागति, एवं मृत्यु के सम्मुख खड़े होकर भी जीवन-दर्शन की निर्भीक प्रस्तुति — ये पृष्ठ केवल पठनीय नहीं, अपितु आँखें भिगो देने वाले हैं।

बिस्मिल जी एक प्रखर कवि एवं साहित्यकार भी थे। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’, ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’, एवं अन्य अनेक उद्बोधक रचनाओं के रचयिता। आत्मकथा में उनकी कविताओं, शायरियों एवं साहित्यिक रुझान की भी झलक मिलती है। उनकी हिन्दी-उर्दू मिश्रित भाषा-शैली, उनकी प्रांजल अभिव्यक्ति, एवं उनकी emotional intensity — यह सब उन्हें एक complete personality के रूप में प्रकट करते हैं।

आत्मकथा का एक मूल्यवान आयाम है — बिस्मिल जी के क्रांतिकारी साथियों के व्यक्तित्व-चित्र। अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ — जिनके साथ उनकी मित्रता हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का अमर प्रतीक बन गई — का चित्रण विशेष रूप से हृदयस्पर्शी है। चन्द्रशेखर आज़ाद, सचीन्द्रनाथ बक्शी, राजेन्द्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह — इन क्रांतिकारियों के व्यक्तित्व का प्राथमिक स्रोत-दर्शन इस आत्मकथा में उपलब्ध है।

ग्रंथ की भाषा बिस्मिल जी की अपनी प्रांजल हिन्दी-उर्दू है — जो साहित्यिक उत्कृष्टता एवं emotional sincerity का अद्वितीय समन्वय है।

स्वातंत्र्य संग्राम के विद्यार्थियों, क्रांतिकारी इतिहास के शोधार्थियों, हिन्दी-उर्दू साहित्य के प्रेमियों, एवं प्रत्येक उस देशभक्त पाठक के लिए जो जागृत भारत के अमर सपूतों के अंतःकरण से साक्षात्कार करना चाहता है — यह आत्मकथा अनिवार्य अध्ययन है। यह केवल एक पुस्तक नहीं — यह एक शहीद की आत्मा की अमर आवाज़ है।

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