Meri Drishti Me Swami Dayanand Evam Unke Karya (Hindi–Sanskrit) – by Pandit Yudhisthir Meemansak | Dayanand Saraswati Biography

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मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द एवं उनके कार्य (Meri Drishti Me Swami Dayanand Evam Unke Karya), विद्वान् व्याकरणाचार्य पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह 384 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक consequential वैदिक सुधारक — महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती — के व्यक्तित्व एवं कार्य का एक scholarly किन्तु आत्मीय परीक्षण है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति एक ऐसे पंडित की लेखनी से प्रसूत है, जिनकी संस्कृत-व्याकरण-वेद-शास्त्र पर गहरी विद्वत्ता थी, और जिन्होंने महर्षि के कार्य का scholarly evaluation अधिकार-पूर्वक प्रस्तुत किया है।
पंडित युधिष्ठिर मीमांसक — आधुनिक काल के एक प्रखर संस्कृत-व्याकरण-विद्वान्, ‘संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास’ जैसी monumental कृति के रचयिता — का यह ग्रंथ scholarly objectivity के साथ-साथ श्रद्धा-भाव का अनुपम संगम है। उन्होंने महर्षि के कार्य को न केवल एक धार्मिक सुधारक के रूप में, अपितु एक scholar, वेद-व्याख्याता, civilisational द्रष्टा एवं शास्त्र-निष्ठ मनीषी के रूप में परीक्षित किया है।
ग्रंथ का प्रथम खण्ड महर्षि के जीवन-वृत्तान्त को scholarly तरीके से प्रस्तुत करता है। काठियावाड़ (गुजरात) के टंकारा में जन्म, तत्कालीन hindu-समाज की religious स्थिति, बाल्यकाल की निर्णायक घटना (शिवरात्रि की रात्रि), गृह-त्याग, संन्यास, स्वामी विरजानन्द से शिक्षा, मथुरा में अध्ययन-काल — इस सम्पूर्ण life-journey का प्रामाणिक विवरण है।
ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र महर्षि की वैदिक vision है। ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ — यह उनका मूल सिद्धान्त था। पंडितजी ने यह scholarly तरीके से दर्शाया है कि कैसे महर्षि ने वेदों को मात्र historical दस्तावेज़ नहीं, अपितु ईश्वर-कृत अपौरुषेय सत्य का ग्रंथ माना; कैसे उन्होंने पारम्परिक sectarian व्याख्याओं से ऊपर उठ कर वेदों की rational एवं ethical दृष्टि प्रस्तुत की।
‘सत्यार्थ प्रकाश’ — महर्षि की magnum opus — का scholarly मूल्यांकन ग्रंथ का एक प्रमुख खण्ड है। इसकी रचना-पृष्ठभूमि, इसके चौदह समुल्लासों की विषय-वस्तु, इसमें प्रतिपादित सिद्धान्त — एकेश्वरवाद, मूर्ति-पूजा का खण्डन, अवतारवाद की समीक्षा, कर्म-फल-सिद्धान्त, मोक्ष-निरूपण, ईसाई-इस्लामी सिद्धान्तों का परीक्षण — इन सब विषयों पर पंडितजी ने scholarly किन्तु sympathetic विचार प्रस्तुत किया है।
‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ की scholarly महत्ता पर एक विशेष अध्याय है। यह कृति महर्षि की वेद-व्याख्यान-पद्धति का manifesto है। निरुक्त-आधारित यौगिक-अर्थ की पद्धति, सायण-भाष्य से उनके मतभेद के मूल-कारण, वैदिक देवता-स्वरूप का scholarly निरूपण — इन सब विषयों पर लेखक ने महर्षि के दृष्टिकोण की systematic exposition प्रस्तुत की है।
आर्य समाज की स्थापना (1875) एवं उसके दश सिद्धान्तों का scholarly परिचय भी ग्रंथ का अंग है। संगठन-निर्माण की methodology, गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्जागरण, यज्ञ-संस्कृति का प्रसार, हिन्दी भाषा का प्रोत्साहन — इन सब महर्षि के कार्यों की scholarly समीक्षा है।
व्याकरणाचार्य के दृष्टिकोण से एक विशेष आयाम है — महर्षि के संस्कृत-ज्ञान एवं व्याकरण-निष्ठा का परीक्षण। पंडितजी ने स्वयं एक प्रखर वैयाकरण होने के नाते यह scholarly assessment प्रस्तुत किया है कि महर्षि का संस्कृत-ज्ञान कितना गहरा था, उनकी व्याख्यान-पद्धति में कौन-से व्याकरणिक आधार थे, उनकी निरुक्त-दृष्टि शास्त्र-सम्मत थी या नहीं — यह scholarly assessment ग्रंथ का एक अनुपम योगदान है।
समाज-सुधार के क्षेत्र में महर्षि के योगदान का comprehensive विवेचन भी है। बाल-विवाह का खण्डन, स्त्री-शिक्षा का प्रबल समर्थन, विधवा-विवाह का समर्थन, अस्पृश्यता का विरोध, जाति-व्यवस्था की कर्म-गुण-आधारित मौलिक व्याख्या — इन reformist पहलों का scholarly chronicling है।
महर्षि के विरोधियों एवं उनके आरोपों की scholarly समीक्षा भी ग्रंथ में है। उनके जीवनकाल में जो शास्त्रार्थ हुए, जो polemical रचनाएँ उनके विरुद्ध आईं, जो आरोप उन पर लगाए गए — इन सब का balanced एवं evidence-based परीक्षण है। पंडितजी ने objectivity बनाए रखी है — महर्षि की महत्ता को रेखांकित करते हुए भी, जहाँ-कहीं scholarly disagreement आवश्यक प्रतीत हुआ, वहाँ अपनी स्वतंत्र दृष्टि भी प्रस्तुत की।
लेखक की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत shastric शब्दावली का सटीक प्रयोग है। 384 पृष्ठीय यह कृति विषय की complexity के अनुरूप एक संतुलित scope प्रस्तुत करती है।
आर्य समाज के साधकों, वेदान्त-दर्शन के विद्यार्थियों, धार्मिक सुधार-इतिहास के researchers, संस्कृत-व्याकरण-शास्त्र के अध्येताओं, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो आधुनिक भारतीय धार्मिक पुनर्जागरण के सर्वोच्च व्यक्तित्व को scholarly तरीके से समझना चाहता है — यह ग्रंथ एक मूल्यवान संसाधन है। पंडित युधिष्ठिर मीमांसक की scholarly लेखनी एवं महर्षि दयानन्द के civilisational कार्य का यह संगम भारतीय बौद्धिक परम्परा का एक गौरवपूर्ण प्रकटीकरण है।
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