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Maharshi Dayanand Ki Pad Prayog Shaili (Hindi–Sanskrit) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Dayanand Grammar Analysis

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महर्षि दयानन्द की पद-प्रयोग-शैली (Maharshi Dayanand Ki Pad Prayog Shaili), व्याकरणाचार्य पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह 56 पृष्ठीय Hindi-Sanskrit द्वि-भाषी ग्रंथ, महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की writing में प्रयुक्त विशिष्ट व्याकरणिक शब्द-प्रयोग-शैली का एक अत्यंत specialized scholarly विश्लेषण प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति महर्षि की scholarly writing-style के linguistic-grammatical dimensions को उजागर करने वाली एक अनूठी कृति है।

एक major व्याकरणाचार्य होते हुए, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने इस specialized अध्ययन में महर्षि दयानन्द के वेद-भाष्य, सत्यार्थ प्रकाश, तथा अन्य कृतियों में प्रयुक्त specific शब्द-रूपों, वाक्य-रचना-पद्धतियों, तथा grammatical constructions का detailed scholarly विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

**Central scholarly प्रश्न** ग्रंथ का यह है — महर्षि, जिन्होंने पाणिनीय व्याकरण का गहन अध्ययन किया था, अपनी वेद-भाष्य-रचना एवं अन्य writings में किस प्रकार की specific pad-prayog (शब्द-प्रयोग) शैली अपनाते थे? क्या उनकी शैली strictly पाणिनीय-नियमों के अनुरूप है, अथवा कुछ specific innovations अथवा deviations हैं?

ग्रंथ के प्रथम खण्ड में महर्षि की सामान्य writing-शैली की विशेषताओं का scholarly विवेचन है — उनकी Sanskrit एवं हिन्दी की मिश्रित शैली, उनकी directness एवं forcefulness, तथा उनकी argumentative-persuasive संरचना।

**विशिष्ट grammatical patterns** का detailed विश्लेषण — महर्षि द्वारा प्रयुक्त specific verb-forms, noun-declensions, तथा compound-constructions का case-by-case scholarly अध्ययन, जिनकी तुलना classical पाणिनीय-मानकों से की गई है।

**निरुक्त-आधारित शब्द-व्युत्पत्तियों** का विश्लेषण भी ग्रंथ का central content है — महर्षि की Vedic-word-interpretation में उनकी specific etymological methodology, तथा उनके द्वारा प्रयुक्त विशिष्ट यौगिक-अर्थ-निर्माण-पद्धति का scholarly विवेचन।

**महर्षि की लेखन-शैली का ऐतिहासिक-भाषिक context** — 19वीं शताब्दी की हिन्दी-Sanskrit writing-conventions के परिप्रेक्ष्य में महर्षि की शैली कैसे distinctive थी, इसका comparative scholarly विश्लेषण।

पंडित मीमांसक की scholarly authority इस विषय में विशेष है — एक स्वयं व्याकरणाचार्य के रूप में, वे महर्षि की writing की technical grammatical subtleties को उस गहराई से analyze कर सकते हैं जो सामान्य पाठक अथवा गैर-व्याकरण-विशेषज्ञ के लिए सम्भव नहीं।

**Practical scholarly value** — यह अध्ययन उन researchers के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो महर्षि के मूल texts का authentic interpretation करना चाहते हैं, तथा उनकी specific grammatical choices के पीछे के rationale को समझना चाहते हैं।

Hindi-Sanskrit द्वि-भाषी प्रस्तुति एवं 56 पृष्ठीय focused आयाम इस specialized अध्ययन को accessible बनाता है।

आर्य समाज के advanced scholars, महर्षि दयानन्द के writings के गम्भीर अध्येताओं, Sanskrit-grammar के researchers, वेद-भाष्य के textual-critics, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो महर्षि की writing-style की grammatical subtleties को गहराई से समझना चाहता है — महर्षि दयानन्द की पद-प्रयोग-शैली एक अनूठा एवं मूल्यवान specialized scholarly संसाधन है।

ग्रंथ के अंतिम अध्याय में पंडित मीमांसक ने कुछ concrete case-studies भी प्रस्तुत की हैं — महर्षि द्वारा प्रयुक्त specific विवादास्पद शब्द-प्रयोगों का detailed grammatical justification, जो कुछ समकालीन आलोचकों द्वारा प्रश्नांकित किए गए थे। यह defense-cum-analysis ग्रंथ को केवल descriptive study से आगे एक scholarly advocacy भी बनाती है, जो महर्षि की भाषिक authority को rigorous grammatical evidence के साथ स्थापित करने का प्रयास करती है, जो आर्य समाज परम्परा के भीतर एक विशेष रूप से मूल्यवान scholarly contribution है। यह विश्लेषण आर्य समाज के विद्वानों के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि scholarly rigor एवं dharmic श्रद्धा किस प्रकार साथ-साथ चल सकती हैं। यह ग्रंथ इस प्रकार भाषा-विज्ञान एवं धर्म-शास्त्र के अनुपम संगम का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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