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Jigyasu Rachna Manjari Part 1 (Hindi) – by Gopal Prasad | Brahmadatta Jigyasu Essays Collection

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जिज्ञासु-रचना-मंजरी (भाग-1) — Jigyasu-Rachna-Manjari (Part-1), श्री गोपाल प्रसाद द्वारा रचित यह विशाल 464 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, आर्य समाज के अमर शहीद पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु की समग्र रचनाओं का एक comprehensive scholarly संकलन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति एक विपुल-लेखक विद्वान् की intellectual legacy को structured एवं accessible रूप में संरक्षित करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु — आर्य समाज परम्परा के एक prolific एवं बहुआयामी scholar-writer — ने अपने जीवनकाल में वेद, व्याकरण, इतिहास, समाज-सुधार, तथा Sanskrit-शिक्षण-methodology सहित अनेक क्षेत्रों में significant contributions किए। यह ‘रचना-मंजरी’ (रचनाओं का पुष्प-गुच्छ) उनकी विविध लेखनी का एक व्यवस्थित संकलन है, जो पहली बार सुव्यवस्थित रूप से एक स्थान पर उपलब्ध कराया गया है।

ग्रंथ के प्रथम खण्ड में जिज्ञासु जी के वैदिक-शास्त्रीय निबंधों का संकलन है। वेद-प्रामाण्य, वैदिक एकेश्वरवाद, मूर्ति-पूजा की समीक्षा, अवतारवाद पर scholarly critique — यह सब आर्य समाज की classical polemical परम्परा के प्रतिनिधि निबंध हैं, जो उनकी गहन शास्त्रीय विद्वत्ता को प्रदर्शित करते हैं।

व्याकरण-शास्त्र से सम्बन्धित उनकी रचनाओं का संकलन भी ग्रंथ का एक महत्त्वपूर्ण अंश है। संस्कृत-शिक्षण-methodology पर उनके innovative विचार, जो उनकी प्रसिद्ध कृति ‘The Tested Easiest Method for Learning and Teaching Sanskrit’ में भी परिलक्षित होते हैं, इस संकलन में और भी विस्तार से प्रस्तुत किए गए हैं।

ऐतिहासिक निबंधों का खण्ड भी उल्लेखनीय है — भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर, विशेष रूप से आर्य समाज एवं स्वातंत्र्य संग्राम से सम्बन्धित विषयों पर, उनके scholarly विश्लेषण। ऐतिहासिक साक्ष्यों के प्रति उनकी critical rigor एवं तर्कसंगत विवेचन-शैली इन निबंधों की विशेषता है।

समाज-सुधार से सम्बन्धित रचनाओं में जातिगत भेदभाव, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह-विरोध जैसे विषयों पर उनके प्रगतिशील विचार संकलित हैं, जो महर्षि दयानन्द की reformist विरासत की continuation दर्शाते हैं।

गोपाल प्रसाद जी की editorial methodology systematic एवं scholarly है। उन्होंने जिज्ञासु जी की बिखरी हुई रचनाओं — पत्र-पत्रिकाओं, प्रवचनों, अप्रकाशित पाण्डुलिपियों — को एकत्रित कर एक coherent, chronologically-organized संकलन प्रस्तुत किया है। प्रत्येक निबंध के साथ आवश्यक contextual notes भी दिए गए हैं, जो पाठक को उस रचना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझने में सहायक हैं।

‘भाग-1’ का designation यह इंगित करता है कि यह जिज्ञासु जी की समग्र रचनाओं का केवल प्रथम खण्ड है — जो उनके लेखन की विपुलता का प्रमाण है, तथा भविष्य में आगामी खण्डों की सम्भावना को भी indicate करता है।

लेखक की भाषा प्रांजल, तर्कसंगत, एवं persuasive हिन्दी है, जो आर्य समाज के classical scholarly-polemical शैली का प्रतिनिधित्व करती है। 464 पृष्ठीय विशाल आयाम विषय की comprehensiveness के अनुरूप है।

आर्य समाज के साधकों, पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के अध्येताओं, आधुनिक भारतीय बौद्धिक इतिहास के researchers, Sanskrit-शिक्षण-methodology में रुचि रखने वाले शिक्षकों, समाज-सुधार-इतिहास के विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो एक बहुआयामी आर्य समाजी विद्वान् की समग्र intellectual legacy का scholarly परिचय चाहता है — जिज्ञासु-रचना-मंजरी (भाग-1) एक मूल्यवान संकलन-ग्रंथ है।

ग्रंथ के अंत में गोपाल प्रसाद जी ने एक विषय-वार सूचकांक भी प्रदान किया है, जो पाठकों को जिज्ञासु जी के विशाल लेखन-भण्डार में से specific विषयों पर उनकी रचनाओं को शीघ्रता से locate करने में सहायक है। यह practical organizational tool ग्रंथ को केवल एक chronological anthology से आगे, एक genuinely usable scholarly reference बनाता है। साथ ही, कुछ दुर्लभ रचनाओं के original manuscript-sources का भी brief उल्लेख किया गया है, जो भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए primary-source-tracking में सहायक होगा। इस प्रकार का व्यवस्थित संकलन जिज्ञासु जी की विद्वत्ता को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं सुलभ बनाता है, जो अन्यथा बिखरे हुए स्रोतों में लुप्त हो सकती थी। यह संरक्षण-कार्य स्वयं में एक महत्त्वपूर्ण civilisational योगदान है।

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