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Jabta Shuda Kahaniya (Hindi) – by Munshi Premchand | Banned Nationalist Stories

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ज़ब्तशुदा कहानियाँ (Jabta Shuda Kahaniya), उपन्यास सम्राट् मुंशी प्रेमचन्द द्वारा रचित यह विख्यात् कथा-संग्रह, हिन्दी साहित्य की उस दुर्लभ विरासत का प्रतिनिधित्व करता है जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने अपनी राष्ट्रवादी चेतना एवं unflinching सामाजिक टिप्पणी के कारण निषिद्ध (proscribed) घोषित किया था। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत यह 285 पृष्ठीय हिन्दी संस्करण उन एक समय प्रतिबन्धित आख्यानों को साहित्यिक साहस एवं देशभक्त अंतःकरण के स्थायी प्रमाण के रूप में संरक्षित करता है।

मुंशी प्रेमचन्द — जिनकी कलम ने हिन्दी एवं उर्दू कथा-साहित्य को सामाजिक जागरण का माध्यम बना दिया — ने लघुकथा-विधा का प्रयोग औपनिवेशिक शासन की क्रूरताओं, किसान-वर्ग की दुर्दशा, जाति एवं वर्ग की अन्यायपूर्ण संरचनाओं, श्रम की गरिमा, एवं ग्रामीण भारत की नैतिक चेतना को उद्घाटित करने हेतु किया। इस संग्रह में संगृहीत आख्यान उनके characteristic stark realism, गहरी संवेदनशीलता एवं मौन प्रतिरोध — इन गुणों के समन्वय का साक्षात् रूप हैं। यही गुण थे जिन्हें ब्रिटिश censors ने साम्राज्य-व्यवस्था के लिए ख़तरा माना।

ज़ब्तशुदा होने का अर्थ केवल यह नहीं था कि किताब बाज़ार से उठा ली गई — यह उस पुस्तक एवं उसके लेखक के विरुद्ध सरकार की औपचारिक घोषणा थी कि यह सामग्री ‘राजद्रोही’ है। यह घोषणा ही प्रेमचन्द के साहित्य की नैतिक शक्ति का सर्वोच्च प्रमाण है। जिस लेखक की कलम साम्राज्य को कँपा सके, वह नियति का प्रसाद नहीं — परिश्रम, साहस एवं अंतःकरण की उपलब्धि है।

संग्रह की प्रत्येक कथा प्रेमचन्द-संसार की एक छोटी किन्तु प्रकाशमान खिड़की है। ‘सोज़े-वतन’ संग्रह से ही उनकी ज़ब्ती की कहानी प्रारम्भ हुई थी — जिसने उन्हें ‘धनपत राय’ से ‘प्रेमचन्द’ नाम धारण करने पर विवश किया। तब से लेकर परवर्ती ज़ब्तशुदा रचनाओं तक, प्रेमचन्द की लेखनी अनवरत समाज-सत्य के अन्वेषण में रत रही।

इन कथाओं में किसान का संत्रास है — महाजन के कर्ज़ में दबा, ज़मींदार के अत्याचार से जूझता, अंग्रेज़ अधिकारी की धौंस से कुचला जाता हुआ। ‘कफ़न’ की वह करुण-त्रासदी, ‘पूस की रात’ का वह जमा देने वाला यथार्थ, ‘सद्गति’ की वह सामाजिक चीख़ — इन सबमें प्रेमचन्द एक क्रांतिकारी के रूप में सामने आते हैं, जो शस्त्र नहीं उठाते किन्तु शब्द से वही कार्य कर देते हैं जो शस्त्र भी नहीं कर सकते।

स्त्री-विमर्श का जो स्वर प्रेमचन्द में है, वह अपने युग से कहीं आगे का है। दहेज की कुप्रथा, विधवा का संत्रास, पतिव्रता की पीड़ा, श्रमिक स्त्री की दुर्दशा — इन विषयों पर उनकी रचनाएँ केवल चित्रण नहीं, अपितु सूक्ष्म सामाजिक आलोचना हैं। साथ ही, ऐसी स्त्रियों का चित्रण भी है जो परिस्थितियों के विरुद्ध dignity के साथ खड़ी होती हैं — जो भारतीय नारी की moral resilience का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।

जातिगत भेदभाव, छुआछूत, ग्रामीण व्यवस्था की कठोरताएँ — इन विषयों पर प्रेमचन्द का दृष्टिकोण सहानुभूति-पूर्ण किन्तु तीखा है। वे सुधार के पक्षधर थे, किन्तु imported solutions के नहीं — अपितु भारतीय समाज की अपनी आत्मा में निहित न्याय-बोध के पुनर्जागरण के। उनकी कथाओं में जो moral universe है, वह सम्पूर्णतः भारतीय है — धर्म, कर्म, दया, क्षमा, त्याग — इन्हीं मूल्यों पर अधिष्ठित।

औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वर प्रेमचन्द की रचनाओं में मुखर है किन्तु कभी भी सस्ते nationalism का रूप नहीं लेता। यह जागृत देशभक्ति है, जो सत्य पर अधिष्ठित है। ‘रंगभूमि’ का सूरदास, अनेक कहानियों के अनाम पात्र — ये सब उस भारत के प्रतिनिधि हैं जो साम्राज्य के सम्मुख दब तो रहा था किन्तु झुकने को तैयार नहीं था।

प्रेमचन्द की भाषा प्रांजल, evocative, तथा मिट्टी की सुगन्ध से युक्त है। उन्होंने तत्कालीन हिन्दी-उर्दू मिश्रित जन-भाषा को साहित्यिक स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उनके वाक्य संक्षिप्त, चित्रात्मक एवं भावपूर्ण हैं। यह वही भाषा है जो आज भी, एक शताब्दी पश्चात्, उतनी ही जीवन्त है।

285 पृष्ठीय यह हिन्दी संस्करण इन कथाओं को उनकी साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्ता के योग्य रूप में संरक्षित करता है। साहित्य के विद्यार्थियों, हिन्दी-प्रेमियों, औपनिवेशिक काल के साहित्य के शोधार्थियों, एवं प्रत्येक उस पाठक के लिए जो प्रेमचन्द की लेखनी के माध्यम से जागृत भारत के अंतःकरण से साक्षात्कार करना चाहता है — ज़ब्तशुदा कहानियाँ एक aesthetic आनन्द एवं अमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ — दोनों है। यह संग्रह उस समय का स्मरण है जब साहित्य केवल मनोरंजन नहीं — एक नैतिक कर्म था।

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