Hindu Shreshtata (Hindi) – by Pandit Harbilas Sharda | Hindu Civilisational Classic

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हिन्दू श्रेष्ठता (Hindu Shreshtata), विख्यात् न्यायविद्, समाज-सुधारक एवं विद्वान् पंडित हरबिलास शारदा द्वारा रचित कालजयी कृति ‘Hindu Superiority’ का यह 384 पृष्ठीय हिन्दी रूपान्तरण, सांस्कृतिक आत्म-सम्मान एवं civilisational self-assertion के साहित्य में एक मील का पत्थर है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत यह संस्करण हिन्दू सभ्यता की बौद्धिक, वैज्ञानिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों का एक व्यापक एवं प्रमाण-पुष्ट विवेचन है।
पंडित हरबिलास शारदा का यह ग्रंथ उस ऐतिहासिक काल में रचा गया था जब औपनिवेशिक scholarship ने सुनियोजित ढंग से भारतीय सभ्यता को ‘पिछड़ा’, ‘अंधविश्वासी’ एवं ‘सहायता-योग्य’ सिद्ध करने का प्रयास किया था। शारदाजी ने अपनी विद्वत्ता, न्यायिक प्रशिक्षण एवं आर्य समाज से प्राप्त वैदिक दृष्टि के आधार पर इस अपप्रचार का तर्कसंगत खण्डन प्रस्तुत किया। उन्होंने वेद, उपनिषद्, classical Sanskrit literature, प्राचीन वैज्ञानिक ग्रंथों, विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों एवं आधुनिक शोधकर्ताओं के निष्कर्षों — सभी का व्यापक उपयोग कर एक meticulously documented case प्रस्तुत किया।
ग्रंथ के अध्यायों में हिन्दू सभ्यता के विविध आयामों का scholarly विश्लेषण है। गणित में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त एवं भास्कराचार्य का योगदान, शून्य का आविष्कार, दशमलव पद्धति, बीजगणित का विकास — यह सब प्राथमिक संस्कृत स्रोतों से प्रमाणित किया गया है। खगोल-शास्त्र में ‘सूर्य सिद्धान्त’, ‘आर्यभटीय’, ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ की उपलब्धियाँ; ज्योतिष की प्राचीनता; ग्रहों की गति एवं नक्षत्र-गणना की सूक्ष्मता — इन सब का प्रमाण-सहित विवेचन है।
आयुर्वेद की महान परम्परा — चरक, सुश्रुत, वाग्भट — तथा प्राचीन भारतीय शल्य-चिकित्सा (rhinoplasty सहित), औषधि-निर्माण, धातु-विज्ञान, रसायन-शास्त्र — ये सब हिन्दू वैज्ञानिक उत्कर्ष के प्रमाण-स्वरूप प्रस्तुत हैं। पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ को आधुनिक भाषा-विज्ञान का पूर्व-प्रवर्तक सिद्ध करते हुए शारदाजी ने यह दिखाया है कि संस्कृत व्याकरण की वैज्ञानिक संरचना विश्व में अद्वितीय है।
दर्शन-शास्त्र के क्षेत्र में षड्दर्शन — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त — की गहराई एवं व्यापकता का विवेचन ग्रंथ का एक प्रमुख खण्ड है। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’, ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ — इन महावाक्यों के दार्शनिक निहितार्थ, तथा भारतीय अद्वैत दृष्टि की scholarly महत्ता को इस कृति में सम्यक् प्रकाश में लाया गया है।
न्यायशास्त्र (jurisprudence) में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति एवं अन्य धर्मशास्त्र-ग्रंथों की sophisticated legal architecture का विवेचन है। राजनीति-शास्त्र में कौटिल्य का अर्थशास्त्र, शुक्र-नीति, कामन्दकीय-नीति — इन सब का scholarly तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत है। शिक्षा के क्षेत्र में नालन्दा, तक्षशिला, विक्रमशिला, वलभी जैसी प्राचीन विश्वविद्यालय-परम्परा का गौरवपूर्ण उल्लेख विदेशी विद्यार्थियों — विशेषतः ह्वेन-त्सांग, फा-हियान, इत्सिंग — के समकालीन वृत्तांतों के साथ है।
प्राचीन हिन्दू समाज में नारी की प्रतिष्ठा-संबंधी अध्याय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शारदाजी ने वैदिक काल की विदुषी नारियों — गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा — का साक्ष्य प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया है कि नारी-शिक्षा एवं समान-गरिमा भारतीय परम्परा का मूल अंग है, न कि कोई आधुनिक आयात।
कला, संगीत, स्थापत्य, मूर्ति-कला, साहित्य — इन सबमें हिन्दू सभ्यता की उत्कृष्टता का documented विवेचन ग्रंथ को एक comprehensive civilisational survey बनाता है। सर विलियम जोन्स, मैक्स मूलर, श्रोडर, पॉल ड्यूसन — विदेशी विद्वानों की भारत-विषयक स्वीकृतियों का भी प्रमाण-स्वरूप उल्लेख है।
लेखक का तर्क-प्रवाह विवेचनात्मक एवं प्रमाण-पुष्ट है — कहीं भी मात्र rhetoric नहीं, अपितु citation एवं reasoned argument पर आधारित है। यह scholarly approach ही ग्रंथ को साधारण ‘गौरव-गान’ से पृथक् कर एक authentic intellectual contribution बनाता है।
रचनाकाल के एक शताब्दी से अधिक के पश्चात् भी इस कृति के तर्क अपनी force बनाए हुए हैं, उसकी scholarship अपनी dignity बनाए हुए है। औपनिवेशिक मानस से ग्रसित ऐतिहासिक discourse के विरुद्ध हिन्दू श्रेष्ठता एक मौन किन्तु सशक्त correction है — polemic से नहीं, अपितु patient documentation से। यह कृति प्रत्येक dharmic library, संस्कृत एवं Indology विभाग, तथा अपनी civilisational धरोहर का यथार्थ परिमाण जानने की कामना रखने वाले प्रत्येक सुधी गृहस्थ के संग्रह में होनी चाहिए।
यह ग्रंथ केवल अतीत का स्तवन नहीं — यह वर्तमान के लिए एक उद्बोधन भी है। जब एक सभ्यता अपनी उपलब्धियों को भूल जाती है, तब वह अपनी आत्मा को भी क्रमशः खोने लगती है। पंडित शारदाजी का यह कार्य उस विस्मृति के विरुद्ध एक scholarly हस्तक्षेप है। आज जब विश्व-स्तर पर भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति नूतन रुचि उत्पन्न हो रही है — योग, आयुर्वेद, संस्कृत-अध्ययन, vedic mathematics, हिन्दू दर्शन — तब इस ग्रंथ की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह वैश्विक discourse में भारतीय आवाज़ की उपस्थिति को सशक्त करने का एक साधन भी है।
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