Hindu Mahasabha Aur Congress Ka Itihas (Hindi) – by Rakesh Kumar Arya | Indian Political History

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हिन्दू महासभा और कांग्रेस का इतिहास (Hindu Mahasabha Aur Congress Ka Itihas), सूक्ष्मदर्शी इतिहासकार श्री राकेश कुमार आर्य द्वारा रचित यह 535 पृष्ठीय हिन्दी ऐतिहासिक ग्रंथ, आधुनिक भारतवर्ष के दो सर्वाधिक consequential राजनीतिक संगठनों — अखिल भारतीय हिन्दू महासभा एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस — की समानांतर ऐतिहासिक यात्रा का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह volume उन दो धाराओं का प्रामाणिक एवं संतुलित विवरण है जिनके निर्णयों ने वर्तमान भारत की दिशा निर्धारित की।
लेखक ने 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण एवं 20वीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल — जब राष्ट्रीय जागरण की अग्नि प्रज्वलित हो रही थी — से अपना ऐतिहासिक discourse प्रारम्भ किया है। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तथा 1915 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की औपचारिक स्थापना के पीछे की वैचारिक भूमि, सामाजिक आवश्यकता एवं नेतृत्व-दर्शन का सूक्ष्म विश्लेषण ग्रंथ का प्रारम्भिक खण्ड बनाता है।
कांग्रेस के संस्थापक काल में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल, अरविन्द घोष — इन प्रमुख व्यक्तित्वों की भूमिका तथा ‘नरम दल’ एवं ‘गरम दल’ के मध्य के वैचारिक संघर्ष का सजीव विवेचन है। 1907 के सूरत अधिवेशन का विभाजन, स्वदेशी आन्दोलन, होमरूल लीग — इन सब का राजनीतिक एवं सामाजिक संदर्भ स्पष्ट किया गया है।
हिन्दू महासभा के संस्थापक एवं स्तंभ-स्वरूप व्यक्तित्वों — पंडित मदन मोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द, डॉ. बी. एस. मूँजे, वीर विनायक दामोदर सावरकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी — के योगदान का विस्तृत एवं सम्मानजनक चित्रण है। महामना मालवीय जी की काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना, स्वामी श्रद्धानन्द की शुद्धि एवं संगठन-दृष्टि, सावरकर का ‘हिन्दुत्व’ का दार्शनिक प्रतिपादन तथा ‘Essentials of Hindutva’ के मूल विचार — इन सब पर scholarly आलोक डाला गया है।
ग्रंथ की एक प्रमुख उपलब्धि है — दोनों संगठनों के बीच वैचारिक convergence एवं divergence का संतुलित विश्लेषण। प्रारम्भिक काल में अनेक नेता दोनों मंचों पर सक्रिय थे — मालवीय, लाजपत राय, तिलक — और दोनों संगठनों में सहयोग की एक स्वस्थ धारा प्रवाहित थी। किन्तु 1920 के दशक के बाद, विशेषतः ख़िलाफत आन्दोलन, मोपला कांड, साम्प्रदायिक तनाव एवं कांग्रेस की muslim appeasement नीति के कारण मार्ग पृथक् होते गए। लेखक ने इस divergence का विश्लेषण partisan rhetoric से बचते हुए, प्रामाणिक दस्तावेज़ों, समकालीन भाषणों एवं संगठनात्मक records के आधार पर किया है।
विभाजन के काल का विवेचन ग्रंथ का सर्वाधिक दुखद किन्तु महत्त्वपूर्ण खण्ड है। मुस्लिम लीग की पाकिस्तान-माँग, कांग्रेस की प्रतिक्रिया, हिन्दू महासभा की चेतावनियाँ, गांधीजी की दृष्टि, सरदार पटेल की भूमिका, तथा अन्ततः 1947 के विभाजन की भयावह त्रासदी — इन सब का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत है। लेखक ने यह दिखाया है कि किस प्रकार हिन्दू महासभा द्वारा बार-बार उठाई गई आपत्तियों एवं चेतावनियों को मुख्यधारा के राजनीतिक discourse में पर्याप्त गंभीरता नहीं दी गई।
स्वतंत्रता-पश्चात् दोनों संगठनों की दिशाओं — कांग्रेस का सत्ता-केन्द्रित विकास तथा हिन्दू महासभा का धीरे-धीरे संकुचित होना, उसी समय भारतीय जनसंघ एवं अन्य संगठनों का उदय — इन सब का संक्षिप्त किन्तु अंतर्दृष्टिपूर्ण उल्लेख है।
लेखक ने प्राथमिक दस्तावेज़ों — संगठनों के resolutions, अधिवेशन-वृत्तांत, समकालीन भाषण, पत्र-व्यवहार — का व्यापक उपयोग किया है। साथ ही credible secondary scholarship से भी संवाद किया गया है। यह दृष्टिकोण ग्रंथ को एक balanced एवं evidence-based ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनाता है।
भाषा सहज, गरिमामयी एवं विचार-प्रधान हिन्दी है। 535 पृष्ठों का substantial scope इस संवेदनशील विषय की complexity के अनुरूप है। आधुनिक भारतीय इतिहास के विद्यार्थियों, राजनीति-शास्त्र के शोधार्थियों, पुस्तकालयों एवं प्रत्येक उस गंभीर पाठक के लिए जो भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक भूमि को partisan simplification से परे जाकर ऐतिहासिक accuracy के साथ समझना चाहता है — यह ग्रंथ एक definitive resource है।
इस ग्रंथ की एक विशिष्टता यह है कि यह पाठक को partisan rhetoric से ऊपर उठाकर ऐतिहासिक process की complexity के सम्यक् दर्शन कराता है। यह न तो किसी एक संगठन का स्तुति-गान है, न ही किसी अन्य का खण्डन; अपितु एक अंतर्दृष्टिपूर्ण ऐतिहासिक analysis है जो दोनों संगठनों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक भूमिका को सम्यक् रूप से प्रकाशित करता है। ऐसे विवेचन वर्तमान काल में विशेष रूप से आवश्यक हैं — जब सार्वजनिक विमर्श अनेक बार सरलीकृत narrative पर निर्भर हो जाता है। एक सुधी पाठक को मूल दस्तावेज़, प्रामाणिक भाषण, संगठनात्मक resolutions एवं समकालीन साक्ष्य पर आधारित विवेचन की आवश्यकता है — और यह ग्रंथ ठीक यही प्रदान करता है।
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