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Devon Ki Digvijay (Hindi) – by Swami Darshananand Saraswati | Vedic Devata Concept

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देवों की दिग्विजय (Devon Ki Digvijay), स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 64 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, वैदिक देवता-अवधारणा की एक scholarly पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करता है, जो पौराणिक anthropomorphic देवताओं के स्थान पर वैदिक ‘देव’ शब्द के यौगिक-अर्थ को उजागर करती है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज परम्परा की Vedic-hermeneutics-methodology का एक concise किन्तु सशक्त प्रतिनिधित्व है।

‘देव’ शब्द — जो सामान्यतः ‘god’ अथवा ‘deity’ के रूप में translate किया जाता है — वास्तव में एक व्यापक यौगिक अर्थ रखता है। ‘दिव्’ धातु से व्युत्पन्न यह शब्द ‘प्रकाशमान’, ‘दानशील’, ‘गुणवान’ — इन अर्थों को इंगित करता है। स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती ने अपने इस ग्रंथ में यह scholarly प्रदर्शित किया है कि वैदिक साहित्य में ‘देव’ शब्द का प्रयोग किसी विशिष्ट anthropomorphic पौराणिक देवता के लिए नहीं, अपितु उन गुणों, शक्तियों एवं प्राकृतिक-आध्यात्मिक तत्त्वों के लिए हुआ है जो मानव-जीवन के लिए कल्याणकारी हैं।

‘दिग्विजय’ — शीर्षक का यह द्वितीय अंश — इस ग्रंथ के central metaphor को इंगित करता है। जैसे प्राचीन काल में राजा ‘दिग्विजय’ (चारों दिशाओं की विजय) करते थे, वैसे ही यह ग्रंथ ‘देव’-सिद्धान्त की scholarly ‘विजय-यात्रा’ प्रस्तुत करता है — pौराणिक misinterpretations पर वैदिक सत्य की विजय।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड विभिन्न प्रमुख वैदिक ‘देवों’ — इन्द्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सूर्य, वायु, सोम, मरुत् — का यौगिक-अर्थ-आधारित scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। इन्द्र — ‘इन्द्रियों का स्वामी अथवा शक्ति-सम्पन्न परमात्मा-तत्त्व’; अग्नि — ‘ज्ञान-प्रकाशक तत्त्व’; वरुण — ‘सर्वोत्तम एवं वरणीय परमात्मा’ — यह सब etymological analyses पौराणिक anthropomorphism से भिन्न एक अधिक अमूर्त, philosophical interpretation प्रस्तुत करते हैं।

महर्षि दयानन्द के ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ सिद्धान्त का scholarly application इस ग्रंथ की central methodology है। लेखक यह स्थापित करते हैं कि वैदिक ‘बहु-देववाद’ वास्तव में एक sophisticated एकेश्वरवाद है, जहाँ एक ही ईश्वर के विविध गुण-कर्म-वाचक नामों को अलग-अलग ‘देव’ के रूप में सम्बोधित किया गया है।

pौराणिक पुनर्व्याख्या की ऐतिहासिक प्रक्रिया का भी scholarly विवेचन प्रस्तुत है — कैसे समय के साथ यह अमूर्त वैदिक concepts क्रमशः concrete anthropomorphic mythology में transform हो गए, तथा यह transformation कैसे मूल वैदिक सत्य से एक significant departure थी।

स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती की scholarly शैली सीधी, तर्कसंगत एवं आर्य समाज की classical polemical परम्परा के अनुरूप है। उन्होंने अनेक वेद-मन्त्रों को उद्धृत कर अपने तर्कों का shastric आधार प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ का व्यावहारिक निहितार्थ भी उल्लेखनीय है — यदि ‘देव’ का अर्थ pौराणिक multiple gods नहीं, अपितु एक ही ईश्वर के गुण-नाम हैं, तो मूर्ति-पूजा एवं sectarian worship-practices का shastric आधार भी प्रश्नांकित होता है — यह argument आर्य समाज के broader reform-agenda से जुड़ता है।

64 पृष्ठीय compact आयाम एक focused polemical-scholarly tract के लिए उपयुक्त है, जो अपने विषय पर concentrated एवं सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत करता है।

आर्य समाज के साधकों, वैदिक धर्म के अध्येताओं, comparative religion के researchers, Vedic-hermeneutics में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक देवता-अवधारणा की महर्षि दयानन्द-प्रणीत scholarly पुनर्व्याख्या को समझना चाहता है — देवों की दिग्विजय एक concise किन्तु सशक्त scholarly संसाधन है। यह ग्रंथ अपने संक्षिप्त आकार में भी वैदिक चिन्तन की गहन दार्शनिक जटिलता का प्रामाणिक परिचय प्रस्तुत करता है, तथा पाठक को स्वतन्त्र scholarly विचार हेतु प्रेरित करता है।

ग्रंथ में स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती ने यह भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है कि किस प्रकार यह यौगिक-अर्थ-पद्धति न केवल theoretically सुसंगत है, अपितु वेद के आन्तरिक साहित्यिक साक्ष्य से भी समर्थित होती है — जब एक ही वेद-मन्त्र में कई तथाकथित ‘देवताओं’ का एक साथ उल्लेख होता है, तो यह अधिक सुसंगत रूप से समझा जा सकता है यदि उन्हें एक ही ईश्वर के विविध गुण-नाम माना जाए, न कि पृथक्-पृथक् व्यक्तित्व। लेखक ने इस तर्क को अनेक concrete मन्त्र-उदाहरणों से समर्थित किया है, जिससे यह ग्रंथ पाठक के समक्ष एक ठोस evidence-based scholarly case प्रस्तुत करता है, न कि केवल एक मत-प्रतिपादन।

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