Deerghayu Rahasya (Hindi–Sanskrit) – Ayurveda & Yoga | Longevity Sadhana Compendium

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दीर्घायु रहस्य (Deerghayu Rahasya), विद्वान् आयुर्वेदाचार्यों एवं विषय-विशेषज्ञों के सामूहिक प्रयास से रचित यह 232 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, दीर्घायुष्य की प्राचीन भारतीय परम्परा का एक scholarly एवं व्यावहारिक संकलन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति वेद, उपनिषद्, आयुर्वेद-संहिताओं तथा योग-शास्त्र में निहित उन रहस्यों को सुलझाने का प्रयास करती है, जिनके आधार पर हमारे ऋषि-मुनि शतायु एवं उससे भी अधिक काल तक स्वस्थ, सक्रिय एवं आध्यात्मिक रूप से जागृत जीवन व्यतीत करते थे।
ग्रंथ का मूल प्रस्थान-बिन्दु वैदिक प्रार्थना है — ‘जीवेम शरदः शतम्’ — हम सौ शरद् तक जीवित रहें। किन्तु यह दीर्घायु केवल कालावधि नहीं है — यह स्वस्थ, चेतन, उपयोगी एवं धर्म-संगत जीवन की कामना है। लेखकों ने इसी holistic दृष्टिकोण से दीर्घायु के समस्त आयामों — शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक — का integrated विवेचन प्रस्तुत किया है।
प्रथम खण्ड में आयुर्वेदीय सिद्धान्तों — त्रिदोष (वात-पित्त-कफ), सप्त धातु, त्रिगुण, अग्नि-व्यवस्था, ओज-तेज-प्राण — का systematic विवेचन है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांग हृदय के मूल सूत्रों के आधार पर यह दर्शाया गया है कि कैसे प्रकृति-अनुकूल आहार-विहार, ऋतुचर्या एवं दिनचर्या जीवन-शक्ति की रक्षा करते हैं।
आहार-विज्ञान का खण्ड विशेष रूप से समृद्ध है। षड्रस का सम्यक् सेवन, सात्त्विक-राजसिक-तामसिक भोजन का विवेक, अनुकूल-विरुद्ध आहार का ज्ञान, उपवास का वैज्ञानिक महत्त्व — इन सब का प्रामाणिक विवेचन है। दूध, घी, शहद, फल, अनाज, मसाले — इन सबके medicinal गुणों का scholarly विवरण ग्रंथ को व्यावहारिक मार्गदर्शक बनाता है।
योग एवं प्राणायाम का अध्याय दीर्घायु-साधना का केन्द्रीय आयाम है। पतंजलि के अष्टांग योग का परिचय, प्राण-शक्ति का संरक्षण एवं संवर्धन, कुम्भक के लाभ, ध्यान का शरीर-मन पर प्रभाव — इन पर गहन विचार है। नियमित आसन-अभ्यास से रोग-निवारण, मानसिक स्थिरता एवं आध्यात्मिक उन्नयन — यह त्रिविध फल-सिद्धि कैसे सम्भव है, इसकी सजीव प्रस्तुति है।
रसायन एवं वाजीकरण के पारम्परिक सूत्र — च्यवनप्राश, ब्राह्मी, अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय, आँवला, हरीतकी, त्रिफला — इन rejuvenating द्रव्यों का प्रयोग, मात्रा एवं अनुपान का scholarly विवरण ग्रंथ का एक उपयोगी अंश है। यह केवल पुरातन ज्ञान नहीं — आधुनिक scientific research भी इन herbs के anti-aging एवं immunomodulatory गुणों को क्रमशः प्रमाणित कर रहा है।
मानसिक एवं आध्यात्मिक आयाम पर विशेष बल दिया गया है। ऋषियों ने स्पष्ट कहा है — ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध-मोक्षयोः’। दीर्घायु केवल शरीर का गुण नहीं, अपितु समुन्नत मन एवं प्रसन्न आत्मा का स्वाभाविक परिणाम है। तनाव-प्रबन्धन के पारम्परिक उपाय, सत्संग का महत्त्व, स्वाध्याय की शक्ति, ईश्वर-प्रणिधान का योगदान — इन सब पर scholarly किन्तु practical विचार प्रस्तुत है।
सामाजिक आयाम — परिवार के साथ harmony, सेवा-वृत्ति, संयमित जीवन-शैली, सद्आचरण — इन सबकी दीर्घायु में भूमिका भी ग्रंथ में रेखांकित है। ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व, गृहस्थ धर्म में संयम, वानप्रस्थ की तैयारी — आश्रम-व्यवस्था की वैदिक दृष्टि किस प्रकार स्वाभाविक रूप से दीर्घायु प्रदान करती है, यह दर्शाया गया है।
ग्रंथ में प्रचलित दैनिक रोगों — मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय-रोग, अवसाद, अनिद्रा — के पारम्परिक एवं प्राकृतिक उपचार भी प्रस्तुत हैं। यह उन गृहस्थों के लिए विशेष उपयोगी है जो allopathic medicines पर निर्भरता कम करना चाहते हैं तथा जीवन-शैली परिवर्तन से रोग-निवृत्ति की दिशा में अग्रसर होना चाहते हैं।
ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत सूत्रों एवं प्रामाणिक उद्धरणों का सम्यक् प्रयोग है। प्रत्येक सिद्धान्त के साथ shastric reference तथा व्यावहारिक application — यह संरचना अध्ययन को फलप्रद बनाती है।
आयुर्वेद के विद्यार्थियों, योग-साधकों, स्वास्थ्य-चेतन गृहस्थों, naturopathy practitioners तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो स्वस्थ, संतुलित एवं सुदीर्घ जीवन की कामना रखता है — दीर्घायु रहस्य एक मूल्यवान संसाधन है। यह ग्रंथ उस ऋषि-परम्परा की मौन घोषणा है कि स्वस्थ जीवन कोई भाग्य का विषय नहीं — यह विवेक, संयम एवं प्रकृति-अनुकूल आचरण का स्वाभाविक प्रतिफल है।
ग्रंथ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह योग एवं आयुर्वेद को पृथक् नहीं, अपितु समन्वित दृष्टि से प्रस्तुत करता है। योग की त्रिविध साधना — आसन, प्राणायाम, ध्यान — एवं आयुर्वेद की त्रिविध स्तंभ — आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य — यह षड्विध संयोजन वैदिक स्वास्थ्य-विज्ञान का सम्पूर्ण रूप है। लेखकों ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक काल का खण्डित दृष्टिकोण — जहाँ रोग के एक-एक लक्षण का अलग-अलग इलाज होता है — मूल समस्या का समाधान नहीं कर पाता। आवश्यकता है holistic रूप से समस्त जीवन-शैली के परिवर्तन की, और यह ग्रंथ उसी integrated approach का scholarly मार्गदर्शक है।
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