Daivam Purushakara-Vattikopetam (Sanskrit) – Fate & Free Will Philosophy

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दैवं, पुरुषकार-वत्तिकोपेतम् (Daivam, Purushakara-Vattikopetam), यह 160 पृष्ठीय Sanskrit scholarly ग्रंथ, भारतीय दर्शन के सर्वाधिक प्राचीन एवं गहन प्रश्नों में से एक — ‘दैव’ (भाग्य/नियति) एवं ‘पुरुषकार’ (मानवीय प्रयत्न) के मध्य के relationship — का scholarly किन्तु व्यावहारिक विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति उस classical debate को systematically explore करती है जो सहस्राब्दियों से भारतीय चिन्तकों को engaged करता रहा है।
‘दैव’ एवं ‘पुरुषकार’ के मध्य का relationship भारतीय दर्शन का एक central philosophical crux है। क्या मानव-जीवन पूर्व-निर्धारित नियति से बँधा हुआ है, अथवा मनुष्य अपने स्वतंत्र प्रयत्न से अपने भाग्य को आकार दे सकता है? यह प्रश्न न केवल theoretical philosophy का विषय है, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन-निर्णयों को भी प्रभावित करता है — क्या प्रयत्न करना अर्थपूर्ण है, अथवा ‘जो होना है वह होगा’ की मनोवृत्ति अपनानी चाहिए?
ग्रंथ का शीर्षक ही इस debate की complexity को इंगित करता है — ‘वत्तिक’ (वृत्ति अथवा commentary) ‘उपेत’ (सहित) — अर्थात् यह मूल विषय पर एक commentary-सहित विवेचन है। ग्रंथ का प्रथम खण्ड ‘दैव’ के various shastric definitions का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। क्या दैव पूर्व-जन्म के कर्मों का संचित फल है? क्या यह ईश्वरीय विधान है? क्या यह केवल एक metaphor है प्रकृति के अनियंत्रित कारकों के लिए?
कर्म-सिद्धान्त के साथ दैव का सम्बन्ध scholarly विवेचन का एक प्रमुख विषय है। वैदिक एवं वेदान्तिक दृष्टि में दैव कोई external arbitrary force नहीं, अपितु स्वयं के पूर्व-कर्मों का ही परिणाम है — ‘यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते’। इस framework में दैव एवं पुरुषकार परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक ही cause-effect-continuum के दो पक्ष हैं — वर्तमान पुरुषकार भविष्य के दैव को आकार देता है।
पुरुषकार के महत्त्व पर विशेष scholarly बल दिया गया है। महाभारत, पंचतंत्र, एवं अन्य classical nitishastra texts से उद्धरण देकर यह दर्शाया गया है कि भारतीय परम्परा में प्रयत्नवाद (effort-orientation) को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ — यह classical सूत्र मानवीय प्रयत्न की centrality को रेखांकित करता है।
व्यावहारिक निहितार्थों का विवेचन भी ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है — कैसे यह philosophical understanding दैनिक जीवन-निर्णयों को प्रभावित कर सकती है, कैसे अत्यधिक ‘भाग्यवाद’ निष्क्रियता को जन्म दे सकता है, तथा कैसे संतुलित दृष्टिकोण — पूर्ण प्रयत्न करते हुए परिणाम के प्रति अनासक्त रहना — सर्वाधिक dharmic एवं practical approach है।
विभिन्न classical दार्शनिक schools के दृष्टिकोणों का comparative विवेचन भी प्रस्तुत है — सांख्य, न्याय-वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त — प्रत्येक दर्शन का इस प्रश्न पर क्या विशिष्ट दृष्टिकोण है, इसका scholarly विवेचन।
ग्रंथ की भाषा शास्त्रीय संस्कृत है, जो classical philosophical discourse की गरिमा के अनुरूप है। मूल तर्क-प्रवाह एवं commentary का संयोजन ग्रंथ को scholarly रूप से समृद्ध बनाता है।
दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों, संस्कृत के अध्येताओं, नीति-शास्त्र के researchers, आर्य समाज के साधकों, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो भाग्य एवं प्रयत्न के classical भारतीय dialectics को गहराई से समझना चाहता है — दैवं, पुरुषकार-वत्तिकोपेतम् एक मूल्यवान scholarly संसाधन है।
ग्रंथ के अन्तिम भाग में यह भी विवेचित है कि आधुनिक मनोविज्ञान में ‘locus of control’ का सिद्धान्त — जो यह अध्ययन करता है कि व्यक्ति अपने जीवन की घटनाओं को आंतरिक कारकों (अपने प्रयत्न) अथवा बाह्य कारकों (भाग्य) से प्रभावित मानता है — किस प्रकार इस प्राचीन भारतीय दार्शनिक debate से resonate करता है। यह comparative अध्ययन ग्रंथ को केवल पारम्परिक शास्त्रीय चर्चा से आगे, आधुनिक psychological research के साथ भी एक meaningful संवाद में लाता है। लेखक अंततः यह निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं कि सर्वाधिक balanced एवं dharmic दृष्टिकोण वह है जो पूर्ण निष्ठा से प्रयत्न करे, तथापि परिणाम के प्रति अनासक्त रहे — यह गीता के कर्मयोग-सिद्धान्त के साथ भी सुसंगत है। यह संतुलित दृष्टिकोण न केवल दार्शनिक रूप से सुसंगत है, अपितु मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है, क्योंकि यह अनावश्यक चिंता एवं परिणाम-आसक्ति से मुक्ति प्रदान करता है।
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