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Bhumikabhaskar – Set of 2 Books (Sanskrit–Hindi) – by Swami Vedanand Saraswati | Rigvedadi Bhashya Bhoomika Vistar

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भूमिकाभास्कर (2 भागों का समुच्चय) — Bhumikabhaskar, स्वामी वेदानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 1097 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी विशाल ग्रंथ-समुच्चय, महर्षि दयानन्द सरस्वती की प्रसिद्ध कृति ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ का एक comprehensive scholarly विस्तार एवं व्याख्या प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह monumental कृति आर्य समाज की Vedic-hermeneutics-परम्परा का एक अत्यंत गहन एवं विस्तृत scholarly treatise है।

‘भूमिकाभास्कर’ — ‘भूमिका’ (foundational introduction) + ‘भास्कर’ (सूर्य, illuminator) — यह शीर्षक इंगित करता है कि यह ग्रंथ महर्षि दयानन्द की मूल ‘भूमिका’ को एक सूर्य के समान प्रकाशित करने वाली — अर्थात् उसकी गहन एवं विस्तृत scholarly explanation प्रस्तुत करने वाली — कृति है।

महर्षि दयानन्द की ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ वेद-व्याख्यान-पद्धति का एक foundational manifesto है, किन्तु इसकी सघन, संक्षिप्त, अनेक स्थानों पर cryptic शैली के कारण, इसे fully समझने के लिए एक detailed scholarly commentary की आवश्यकता महसूस की गई। स्वामी वेदानन्द सरस्वती ने अपने 2-भागीय ‘भूमिकाभास्कर’ में यह अपेक्षित scholarly विस्तार प्रदान किया है।

ग्रंथ का प्रथम भाग महर्षि की भूमिका के प्रारम्भिक अध्यायों — वेद-स्वरूप, वेदों की अपौरुषेयता, वेद-प्रामाण्य, वेदाङ्गों का परिचय — का detailed scholarly विस्तार प्रस्तुत करता है। प्रत्येक मूल सूत्र अथवा कथन को स्वामी वेदानन्द ने extensively elaborated किया है, अतिरिक्त shastric evidence, comparative references, तथा contemporary applications के साथ।

महर्षि की interpretive methodology — निरुक्त-आधारित यौगिक-अर्थ-पद्धति — का विस्तृत scholarly विवेचन ग्रंथ का central content है। कैसे वैदिक शब्दों के pौराणिक देव-वाचक अर्थों के बजाय उनके मूल etymological अर्थों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इसका systematic exposition, अनेक concrete उदाहरणों के साथ।

द्वितीय भाग में सृष्टि-विज्ञान, ईश्वर-तत्त्व-निरूपण, जीव-तत्त्व, प्रकृति-तत्त्व — यह वैदिक cosmological एवं metaphysical सिद्धान्तों का विस्तृत scholarly exposition है, जो महर्षि की मूल संक्षिप्त प्रस्तुति को comprehensive detail के साथ elaborate करता है।

सायण-भाष्य से महर्षि के मतभेदों का विस्तृत scholarly विश्लेषण भी ग्रंथ में है — प्रत्येक specific interpretive disagreement का case-by-case विवेचन, evidence-based argumentation के साथ, जो पाठक को दोनों दृष्टिकोणों को समझने में सहायक है।

विरोधी दृष्टिकोणों (traditional pauranic interpretations, पाश्चात्य Indological readings) का भी scholarly acknowledgment एवं response ग्रंथ में है, जो इसे एक balanced, rigorous scholarly discourse बनाता है, न कि केवल एक-पक्षीय propaganda।

व्याकरण-शास्त्रीय आधार का विस्तृत विवेचन भी उल्लेखनीय है — कैसे पाणिनीय व्याकरण एवं निरुक्त-शास्त्र महर्षि की Vedic-interpretation-methodology के technical foundation हैं, इसका scholarly exposition।

स्वामी वेदानन्द सरस्वती की writing-शैली scholarly rigor एवं accessibility का सुन्दर संतुलन प्रस्तुत करती है — जटिल philosophical एवं philological concepts को systematic, step-by-step प्रस्तुति में व्याख्यायित किया गया है।

1097 पृष्ठीय विशाल आयाम, 2-भागीय संरचना — यह ग्रंथ-समुच्चय महर्षि दयानन्द की Vedic-hermeneutics-methodology का सर्वाधिक comprehensive scholarly विस्तार है, जो आर्य समाज साहित्य में एक central reference-work का दर्जा रखता है।

आर्य समाज के साधकों, Vedic-hermeneutics के advanced researchers, वेदान्त-दर्शन के विद्यार्थियों, comparative religion के scholars, संस्कृत-वेद-शास्त्र के अध्येताओं, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो महर्षि दयानन्द की वेद-व्याख्यान-पद्धति को उसकी सम्पूर्ण गहराई में समझना चाहता है — भूमिकाभास्कर (2 भाग) एक indispensable ultimate scholarly संसाधन है।

ग्रंथ के परिशिष्ट में स्वामी वेदानन्द सरस्वती ने एक comprehensive glossary भी प्रदान की है, जो महर्षि दयानन्द की भूमिका में प्रयुक्त technical Vedic-hermeneutics-शब्दावली को स्पष्ट करती है। यह ready-reference tool नए विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जो पहली बार इस जटिल किन्तु foundational कृति का अध्ययन कर रहे हैं। इस प्रकार का systematic pedagogical-apparatus ग्रंथ को केवल advanced scholars तक सीमित न रख कर, गंभीर नए विद्यार्थियों के लिए भी सुलभ बनाता है। यह ग्रंथ-समुच्चय इस प्रकार आर्य समाज साहित्य में एक स्थायी scholarly स्तम्भ के रूप में स्थापित हो चुका है, जिसे आगामी पीढ़ियाँ निरन्तर संदर्भ हेतु उपयोग करती रहेंगी।

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