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Bhartiya-Prachin-Rajniti (Hindi) – by Pandit Bhagwaddatt | Ancient Indian Political History

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भारतीय-प्राचीन-राजनीति (Bhartiya-Prachin-Rajniti), विख्यात् इतिहासकार पंडित भगवद्दत्त द्वारा रचित यह हिन्दी scholarly ग्रंथ, प्राचीन भारत की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था, राज्य-सिद्धान्त, तथा शासन-दर्शन का एक comprehensive scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति आधुनिक भारतीय political-history-scholarship की एक authoritative रचना है।

पंडित भगवद्दत्त — आधुनिक काल के एक प्रखर इतिहासकार, जिन्होंने वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक के भारतीय इतिहास पर अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ रची हैं — इस ग्रंथ में प्राचीन भारतीय राज्य-व्यवस्था के civilisational वैभव को scholarly तरीके से उजागर करते हैं।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड वैदिक-कालीन राजनीतिक संस्थाओं का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है — ‘सभा’ एवं ‘समिति’ — यह दो प्राचीन जन-प्रतिनिधि संस्थाएँ, राजा का चुनाव एवं जन-सहमति की भूमिका, तथा प्रारम्भिक वैदिक समाज की decentralized, participatory शासन-व्यवस्था।

**राजा का concept एवं कर्तव्य** — वैदिक एवं परवर्ती शास्त्रों में राजा को ‘प्रजा-पालक’ के रूप में परिभाषित किया गया है, न कि absolute autocrat के रूप में। ‘प्रजा-सुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्’ — प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है — यह सिद्धान्त प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है।

**अर्थशास्त्रीय परम्परा** — कौटिल्य के अर्थशास्त्र का scholarly विवेचन, जो प्राचीन भारत का सर्वाधिक systematic political-administrative treatise है। राज्य के सात अंग (सप्तांग सिद्धान्त), मंत्रि-परिषद् की भूमिका, गुप्तचर-व्यवस्था, कर-प्रणाली, न्याय-व्यवस्था — यह सब कौटिल्य के sophisticated political-thought का scholarly विवेचन।

**गणराज्यों का इतिहास** — वैशाली, लिच्छवी, मल्ल, शाक्य जैसे प्राचीन भारतीय गणराज्यों (republics) का historical विवेचन, जो प्रमाणित करते हैं कि collective, quasi-democratic governance की परम्परा भारत में गहराई से निहित थी।

**मौर्य, गुप्त, तथा अन्य साम्राज्यों** की प्रशासनिक व्यवस्था का scholarly chronicling भी ग्रंथ का एक महत्त्वपूर्ण अंश है — केन्द्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन, राजस्व-व्यवस्था, सैन्य-संगठन, तथा न्याय-प्रणाली।

**राज-धर्म एवं नैतिक शासन** — प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन में नैतिकता एवं शासन के बीच का अटूट सम्बन्ध, जहाँ राजा को केवल शक्ति-सम्पन्न नहीं, अपितु धर्म-निष्ठ होना अनिवार्य माना गया।

**न्याय-व्यवस्था का विवेचन** — प्राचीन भारतीय न्यायिक संस्थाएँ, विवाद-निवारण की पद्धतियाँ, तथा दण्ड-व्यवस्था के sophisticated सिद्धान्त।

**समकालीन प्रासंगिकता** — पंडित भगवद्दत्त यह argument प्रस्तुत करते हैं कि आधुनिक भारतीय लोकतंत्र को अपनी civilisational जड़ों के साथ पुनः जोड़ने की आवश्यकता है, तथा प्राचीन भारतीय राजनीतिक wisdom आधुनिक शासन-चुनौतियों के लिए भी valuable insights प्रदान कर सकती है।

ग्रंथ की भाषा scholarly किन्तु accessible हिन्दी है, जिसमें प्रचुर historical एवं shastric references हैं, जो लेखक की गहन ऐतिहासिक विद्वत्ता को प्रदर्शित करते हैं।

राजनीति-विज्ञान के विद्यार्थियों, भारतीय इतिहास के अध्येताओं, civil services के अभ्यर्थियों, comparative political-theory के researchers, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो प्राचीन भारत की civilisational राजनीतिक wisdom को गहराई से समझना चाहता है — भारतीय-प्राचीन-राजनीति एक मूल्यवान scholarly संसाधन है।

पंडित भगवद्दत्त ने ग्रंथ के समापन में यह भी आह्वान किया है कि भारतीय शिक्षा-प्रणाली में political-science एवं history के पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन को उचित एवं गौरवपूर्ण स्थान मिलना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी अपनी civilisational राजनीतिक विरासत से परिचित हो सके। यह educational-advocacy ग्रंथ को केवल historical analysis से आगे एक forward-looking civic-education-recommendation भी बनाती है, जो राष्ट्रीय आत्म-गौरव एवं सांस्कृतिक निरन्तरता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार यह ग्रंथ न केवल एक historical दस्तावेज़ है, अपितु राष्ट्र-निर्माण की दिशा में भी एक प्रेरक scholarly योगदान प्रस्तुत करता है।

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