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Bharat Varsh Ka Itihas (Hindi) – by Lala Lajpat Rai | Classic Indian History

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भारतवर्ष का इतिहास (Bharat Varsh Ka Itihas), पंजाब केसरी लाला लाजपत राय द्वारा रचित यह कालजयी ऐतिहासिक ग्रंथ, भारतीय इतिहास-लेखन की परम्परा का एक स्तंभ-स्वरूप कृति है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत 390 पृष्ठीय यह edition उस महान देशभक्त, समाज-सुधारक एवं प्रखर विचारक की लेखनी से प्रसूत है, जिन्होंने ‘सिमॉन कमीशन गो बैक’ के नारे के साथ अपना अंतिम बलिदान भी इसी मातृभूमि को अर्पित किया।

लालाजी की यह कृति सामान्य ऐतिहासिक संकलन नहीं है — यह एक जागृत राष्ट्र-चेतना की अभिव्यक्ति है। उन्होंने प्राचीन वैदिक सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक भारतवर्ष की civilisational यात्रा का ऐसा scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है, जो औपनिवेशिक इतिहास-लेखन की विकृतियों का तर्कसंगत खण्डन करता है। ग्रंथ की मूल दृष्टि यह है कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, अपितु एक जीवन्त सांस्कृतिक continuum है — जिसकी आत्मा वेद, उपनिषद्, धर्मशास्त्र एवं दर्शन-परम्परा में निवास करती है।

लेखक ने वैदिक काल की सामाजिक संरचना, यज्ञ-संस्कृति, गुरुकुल परम्परा, राजनीतिक संगठन एवं आर्थिक व्यवस्था का प्रामाणिक वर्णन प्रस्तुत किया है। तत्पश्चात मौर्य, गुप्त, हर्ष, चालुक्य, चोल एवं विजयनगर जैसे महान साम्राज्यों का उत्थान-पतन, उनकी प्रशासनिक प्रणाली, सांस्कृतिक उपलब्धियों एवं विदेशी आक्रमणों के प्रति उनके प्रतिरोध का सजीव चित्रण किया गया है। मध्यकाल के विवेचन में लालाजी ने मुग़ल आक्रमणों, हिन्दू प्रतिरोध — विशेषतः महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोबिन्द सिंह, बंदा बहादुर एवं मराठा शक्ति — का गौरवपूर्ण उल्लेख किया है।

औपनिवेशिक काल का विश्लेषण विशेष रूप से प्रखर है। लाजपत राय ने यह स्पष्ट किया है कि किस प्रकार British East India Company ने व्यापारिक छल, राजनीतिक षड्यंत्र एवं सैन्य आक्रमण के संयुक्त उपायों से भारत पर अधिकार किया, तथा कैसे उसकी आर्थिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक नीतियों ने भारतीय सभ्यता को क्षति पहुँचाने का सुनियोजित प्रयास किया। 1857 के स्वातंत्र्य समर का उनका विवेचन उस दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत करता है जो इसे केवल ‘सिपाही विद्रोह’ नहीं, अपितु प्रथम स्वातंत्र्य युद्ध मानता है।

ग्रंथ का एक प्रमुख वैशिष्ट्य यह है कि लेखक ने प्राथमिक स्रोतों — संस्कृत ग्रंथ, पुरातात्विक साक्ष्य, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, शिलालेख एवं समकालीन दस्तावेज़ — का व्यापक उपयोग किया है। साथ ही, उन्होंने Western historians के अनुसंधान से भी संवाद किया है, किन्तु आत्म-गौरव एवं indigenous interpretative framework को कहीं भी विस्मृत नहीं किया। यह दृष्टिकोण भारतीय इतिहास-लेखन में एक नई परम्परा का प्रवर्तक सिद्ध हुआ।

लालाजी की भाषा गरिमामयी, संस्कारयुक्त एवं विचार-प्रधान है। उनकी हिन्दी में संस्कृत-निष्ठ शब्दावली, स्पष्ट तार्किक प्रवाह तथा देशभक्ति की अंतर्निहित आँच — ये सभी मिलकर एक ऐसी प्रस्तुति उत्पन्न करती हैं जो पाठक को केवल सूचित नहीं करती, अपितु उसे राष्ट्र-चेतना से अनुप्राणित भी करती है। यह वह दुर्लभ ग्रंथ है जिसमें academic rigour तथा spiritual gravitas — दोनों का दर्शन होता है।

स्वातंत्र्य संग्राम के एक अग्रणी सेनानी की लेखनी से प्रसूत होने के कारण इस कृति को एक विशेष ऐतिहासिक authenticity प्राप्त है — यह उस चेतना का दस्तावेज़ है जिसने स्वयं इतिहास रचा। इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, राष्ट्रवादी विचारकों, शिक्षकों एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो भारतवर्ष के अतीत को औपनिवेशिक चश्मे से नहीं, अपितु स्वदेशी दृष्टि से समझना चाहता है — यह ग्रंथ अनिवार्य है। यह केवल पुस्तक नहीं, अपितु एक जागृत राष्ट्र-पुरुष की वैचारिक धरोहर है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने रचनाकाल में थी।

इस संस्करण की प्रकाशकीय गुणवत्ता विषय की गरिमा के अनुरूप है। मुद्रण, पृष्ठ-सज्जा एवं बंधाई — सभी इसे एक संग्रहणीय कृति बनाते हैं। 1865 में जन्मे लालाजी ने पंजाब के लाहौर में जो scholarly जीवन प्रारम्भ किया, उसका परिणाम अनेक कालजयी ग्रंथ हैं — जिनमें यह ‘भारतवर्ष का इतिहास’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डी.ए.वी. आन्दोलन के सहयोगी के रूप में उन्होंने जिस शैक्षणिक संस्कृति की नींव रखी, उसी संस्कृति की वैचारिक भूमि इस ग्रंथ में अभिव्यक्त होती है। 1928 में लाठी-प्रहार से मातृभूमि पर बलिदान देने वाले इस महान् सपूत की लेखनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने रचनाकाल में थी। प्रत्येक भारतीय जो अपने राष्ट्र के अतीत को आत्म-गौरव के साथ जानना चाहता है, उसके लिए यह ग्रंथ केवल पठनीय नहीं, अपितु अनिवार्य रूप से अध्ययनीय है। यह विश्वविद्यालयों के इतिहास विभागों, सार्वजनिक पुस्तकालयों एवं deshabhakta गृहस्थों — सभी के लिए एक स्थायी सम्पदा है।

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