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Bharat Ke Mahan Krantikari (Hindi) – by Dharmpal Bhakar | Indian Revolutionaries History

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भारत के महान क्रांतिकारी (Bharat Ke Mahan Krantikari), विद्वान लेखक श्री धर्मपाल भाकर द्वारा रचित यह 298 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, उन अमर सपूतों को समर्पित एक श्रद्धांजलि-स्वरूप ऐतिहासिक कृति है जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह volume भारतवर्ष के स्वाधीनता संग्राम के उन रत्नों की गाथा प्रस्तुत करता है, जिनकी तपस्या, त्याग, बलिदान एवं अदम्य देशभक्ति ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आधारशिला को हिला दिया था।

लेखक ने अत्यंत गहन शोध एवं प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, सुखदेव, राजगुरु, वीर सावरकर, खुदीराम बोस, सूर्य सेन, मदन लाल ढींगरा एवं अन्य अनेक प्रसिद्ध तथा कम-चर्चित किन्तु समान रूप से प्रातः-स्मरणीय क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्तांत प्रस्तुत किए हैं। प्रत्येक क्रांतिकारी का चित्रण उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि, वैचारिक संरचना, संगठनात्मक कार्य एवं अंतिम बलिदान — इन समस्त आयामों के साथ किया गया है।

इस कृति की विशिष्टता इसी में निहित है कि यह scholarly approach तथा reverential tone — दोनों का समन्वय करती है। यह न तो शुष्क ऐतिहासिक विवरण मात्र है, न ही केवल भावुक स्तुति-गान; अपितु तथ्य, साक्ष्य एवं गहन वैचारिक analysis के आधार पर रचा गया एक संतुलित ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। पुस्तक हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन, ग़दर पार्टी, अनुशीलन समिति, युगांतर तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों की आंतरिक संरचना, कार्यप्रणाली एवं विचारधारात्मक आधार पर भी विस्तृत प्रकाश डालती है।

लेखक ने काकोरी काण्ड, लाहौर षड्यंत्र केस, चटगाँव शस्त्रागार पर आक्रमण, असेम्बली बम काण्ड एवं अन्य ऐतिहासिक घटनाओं का सजीव वर्णन प्रस्तुत किया है। भगत सिंह के ‘Why I Am An Atheist’, बिस्मिल की ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’, तथा सावरकर के क्रांतिकारी साहित्य का intellectual विवेचन भी ग्रंथ का गौरव बढ़ाता है। साथ ही, उन वीरांगनाओं — झलकारी बाई, दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी, कल्पना दत्त — का स्मरण भी है जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में प्रायः उपेक्षित किया गया।

यह volume उस दृष्टिकोण को भी चुनौती देता है जो भारत की स्वतंत्रता को केवल एक राजनीतिक negotiation का परिणाम मानता है। लेखक ने प्रमाणपूर्वक यह स्पष्ट किया है कि क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष तथा उनका सर्वोच्च बलिदान ही वह आधारशिला है जिस पर स्वतंत्र भारत का भवन खड़ा हुआ। यह दृष्टि न केवल ऐतिहासिक सत्य के अधिक निकट है, अपितु राष्ट्र की वर्तमान पीढ़ी को आत्म-गौरव एवं कर्तव्य-बोध से भी अनुप्राणित करती है।

ग्रंथ की भाषा सहज, प्रांजल एवं संस्कारयुक्त हिन्दी है, जो academic readers तथा सामान्य पाठकों — दोनों के लिए सुलभ है। प्रकाशन की गुणवत्ता विषय की गरिमा के अनुरूप है, जो इसे personal collections, dharmic libraries तथा शैक्षणिक संस्थानों — सभी के लिए एक उपयुक्त संग्रहणीय कृति बनाती है।

इतिहासकारों, शोधार्थियों, छात्रों, शिक्षकों तथा प्रत्येक उस देशप्रेमी पाठक के लिए जो अपनी मातृभूमि के अतीत को उसकी सम्पूर्ण गहराई एवं गरिमा के साथ समझना चाहता है, भारत के महान क्रांतिकारी एक अनिवार्य ग्रंथ है। यह केवल एक पुस्तक नहीं — यह स्मरण का कर्म है, श्रद्धांजलि का स्वरूप है, और जागृत राष्ट्र-चेतना की एक अमूल्य धरोहर है। उन वीरों के रक्त एवं संकल्प से सिंचित इस मातृभूमि का ऋण चुकाने का एक उपाय यह भी है — कि हम उन्हें जानें, उनसे प्रेरणा लें, और उनके स्वप्नों के अनुरूप राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान दें।

इस ग्रंथ की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह उन क्षेत्रीय एवं प्रान्तीय क्रांतिकारियों का भी स्मरण करता है जिन्हें राष्ट्रीय discourse में पर्याप्त स्थान नहीं मिला — पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मद्रास प्रांत के अनगिनत वीर जिन्होंने स्थानीय स्तर पर साम्राज्य के विरुद्ध संगठित संघर्ष किया। यह comprehensive चित्रण इस सत्य को स्थापित करता है कि भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम कोई एक-केन्द्रित आन्दोलन नहीं था — यह सम्पूर्ण भारतवर्ष की भूमि से एक साथ उठी हुई आत्म-गौरव की पुकार थी, जिसमें प्रत्येक प्रान्त, प्रत्येक भाषा-भाषी समुदाय, प्रत्येक वर्ग का योगदान था। यह दृष्टि वर्तमान पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह उन्हें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र-निर्माण कोई एक संगठन या व्यक्ति का कार्य नहीं — यह अनगिनत साधारण किन्तु असाधारण भारतीयों के सामूहिक संकल्प की उपज है। प्रत्येक विद्यालय के पुस्तकालय, प्रत्येक dharmic गृहस्थ के संग्रह तथा प्रत्येक देशभक्त नागरिक की अध्ययन-तालिका पर इस ग्रंथ का स्थान सुरक्षित होना चाहिए।

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