Atharvavedic-Dantyoshthvidhi (Sanskrit–Hindi) – by Ramgopal Shastri | Vedic Pronunciation Guide

Product details
अथर्ववेदिक-दन्त्योष्ठविधि (Atharvavedic-Dantyosthvidhi), विद्वान् श्री रामगोपाल शास्त्री द्वारा रचित यह 14 पृष्ठीय अत्यंत संक्षिप्त किन्तु specialized Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी ग्रंथिका, अथर्ववेदीय पाठ-परम्परा के एक विशिष्ट उच्चारण-सम्बन्धी technical विषय — ‘दन्त्य’ एवं ‘ओष्ठ्य’ वर्णों की सम्यक् उच्चारण-विधि — का एक अत्यंत focused scholarly विवेचन प्रस्तुत करती है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह लघु कृति वेद-पाठ-शुद्धता के एक अत्यंत सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण पक्ष को सम्बोधित करती है।
Sanskrit ध्वनि-विज्ञान (phonetics) में वर्णों का वर्गीकरण उनके उच्चारण-स्थान (स्थान) एवं उच्चारण-प्रयत्न (प्रयत्न) के आधार पर किया जाता है। ‘दन्त्य’ वर्ण (त, थ, द, ध, न) दाँतों के स्पर्श से उच्चारित होते हैं, जबकि ‘ओष्ठ्य’ वर्ण (प, फ, ब, भ, म) होंठों के संयोग से उच्चारित होते हैं। इन दोनों वर्ग के वर्णों की सम्यक्, शुद्ध उच्चारण-विधि वैदिक मन्त्र-पाठ की authenticity के लिए अनिवार्य है।
श्री रामगोपाल शास्त्री ने विशेष रूप से अथर्ववेदीय पाठ-परम्परा के संदर्भ में इन वर्णों के उच्चारण-सम्बन्धी विशिष्ट nuances का scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है। अथर्ववेद की पाठ-परम्परा (शौनकीय एवं पैप्पलाद शाखाओं) में इन वर्णों के उच्चारण में कुछ विशिष्ट पारम्परिक conventions हैं, जो अन्य वेद-शाखाओं से भिन्न हो सकते हैं।
ग्रंथिका में मूल-स्थान (उच्चारण का शारीरिक स्थान) का detailed वर्णन है — जिह्वा, दन्त, ओष्ठ की सटीक स्थिति, वायु-प्रवाह की दिशा, तथा ध्वनि-उत्पत्ति की प्रक्रिया — यह सब phonetic-scientific विवरण।
**Common उच्चारण-त्रुटियों** का भी सूचीकरण एवं correction-guidance दी गई है — वे सामान्य errors जो नए वेद-पाठी प्रायः इन वर्णों के उच्चारण में करते हैं, तथा उन्हें कैसे सुधारा जाए।
शिक्षा-वेदाङ्ग की परम्परा में यह विषय अत्यंत foundational माना जाता है — बिना सम्यक् वर्ण-उच्चारण के, वेद-मन्त्र का ‘मिथ्या-प्रयोग’ हो सकता है, जो प्रसिद्ध सूत्र ‘मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह’ में रेखांकित है — गलत स्वर अथवा वर्ण से प्रयुक्त मन्त्र अपना अर्थ नहीं देता।
Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथिका को वेद-पाठियों एवं Sanskrit-shikshaka — दोनों के लिए सुलभ बनाती है। यह विशेष रूप से उन गुरुकुलों के लिए उपयोगी है जो अथर्ववेदीय पाठ-परम्परा specifically सिखाते हैं।
14 पृष्ठीय अत्यंत संक्षिप्त आयाम इसे एक highly-focused technical reference बनाता है — यह किसी comprehensive treatise का दावा नहीं करता, अपितु एक अत्यंत specific phonetic-topic पर केंद्रित सटीक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
वेद-पाठियों, अथर्ववेदीय परम्परा के शिक्षार्थियों, वैदिक gurukulas के शिक्षकों, Sanskrit-phonetics के researchers, कर्मकाण्ड-conductors जो शुद्ध मन्त्रोच्चारण चाहते हैं, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो अथर्ववेदीय दन्त्य-ओष्ठ्य वर्णों की सम्यक् उच्चारण-विधि सीखना चाहता है — यह ग्रंथिका एक मूल्यवान specialized संसाधन है।
श्री रामगोपाल शास्त्री ने ग्रंथिका में यह भी scholarly नोट प्रस्तुत किया है कि इस प्रकार के सूक्ष्म phonetic-detail का अध्ययन केवल ritualistic शुद्धता के लिए नहीं, अपितु Sanskrit भाषा-विज्ञान के historical-comparative अध्ययन के लिए भी मूल्यवान है। विभिन्न वेद-शाखाओं की उच्चारण-परम्पराओं में सूक्ष्म भिन्नताएँ, प्राचीन भारत की dialectal diversity एवं भाषा-विकास का एक valuable साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।
यह ग्रंथिका विशेष रूप से उन गुरुकुलों एवं वेद-पाठशालाओं के लिए designed है जो अथर्ववेदीय पाठ-परम्परा विशेष रूप से सिखाते हैं, जहाँ इस प्रकार का सूक्ष्म तकनीकी मार्गदर्शन नए विद्यार्थियों की उच्चारण-शुद्धता सुनिश्चित करने में तत्काल सहायक सिद्ध होता है, तथा वेद-पाठ की सहस्राब्दियों पुरानी मौखिक-परम्परा के संरक्षण में एक छोटा किन्तु महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। यह सूक्ष्म किन्तु आवश्यक ज्ञान वेद-पाठ की गुणवत्ता को स्थायी रूप से समृद्ध करता है।
Shipping and Returns
Shipping cost is based on weight. Just add products to your cart and use the Shipping Calculator to see the shipping price.
We want you to be 100% satisfied with your purchase. Items can be returned or exchanged within 30 days of delivery.
There are no question found.




Rating & Review
There are no reviews yet.