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Ashvalayana Sutra Prayoga Deepika (Sanskrit) – by Dr. Dharmveer Vidyavaridhi | Vedic Karmakand Guide

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आश्वलायनसूत्रप्रयोगदीपिका, विद्वान् डॉ. धर्मवीर विद्यावारिधि द्वारा रचित यह 180 पृष्ठीय Sanskrit scholarly ग्रंथ, आचार्य आश्वलायन के गृह्य-सूत्रों के practical application का scholarly-ritual-मार्गदर्शक है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वैदिक कर्मकाण्ड की आश्वलायन गृह्य-परम्परा के प्रयोग-सम्बन्धी विस्तृत विवेचन को प्रस्तुत करती है।

आचार्य आश्वलायन के नाम से जुड़े ग्रंथ ऋग्वेदीय शाखा के कर्मकाण्डीय सिद्धान्तों का foundational exposition प्रस्तुत करते हैं। आश्वलायन गृह्य-सूत्र गृहस्थ-जीवन के षोडश-संस्कारों, नित्य-नैमित्तिक कर्मों एवं यज्ञ-अनुष्ठानों का systematic विधान प्रस्तुत करते हैं।

‘प्रयोग-दीपिका’ का central purpose है — आश्वलायन-सूत्रों के theoretical rules को practical अनुष्ठान-application में कैसे implement किया जाए, इसका systematic scholarly मार्गदर्शन। यह ग्रंथ Vedic priests, purohits, karmakandins के लिए indispensable है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड आश्वलायन-परम्परा का scholarly परिचय, गृह्य-सूत्र की मूल संरचना, गृहस्थ के दैनिक कर्म (सन्ध्या, अग्निहोत्र), नैमित्तिक कर्म एवं संस्कारों (जातकर्म, नामकरण, चूडाकर्म, उपनयन, समावर्तन, विवाह, गृह-प्रवेश, अन्त्येष्टि) का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है।

षोडश-संस्कारों का detailed practical exposition ग्रंथ का most valuable अंग है। प्रत्येक संस्कार के लिए — shastric आधार, appropriate समय, आवश्यक सामग्री, प्रयोज्य मन्त्र, आहुति-द्रव्य एवं समापन-कर्म का scholarly विवेचन।

**उपनयन-संस्कार** का विशेष विस्तृत विवेचन — यज्ञोपवीत की सम्यक् धारण-विधि, वेदारम्भ की traditional procedure, गुरुदक्षिणा का shastric method। **विवाह-संस्कार** का step-by-step मार्गदर्शन — गणेश-पूजा से लेकर सप्तपदी तक, मन्त्रों का सम्यक् उच्चारण, अग्नि-प्रज्वलन विधि। **गृह-प्रवेश-संस्कार** — नए घर में प्रवेश की विधि, वास्तु-शान्ति, गृह-रक्षा-यज्ञ।

**अन्त्येष्टि एवं श्राद्ध-कर्म** — यह sensitive किन्तु important अनुष्ठान — का authentic exposition। मृत्यु-पश्चात् के 13 दिनों की rituals, अस्थि-विसर्जन, वार्षिक श्राद्ध — यह सब का scholarly guidance।

**नित्य-नैमित्तिक कर्म** के अध्याय भी comprehensive हैं — दैनिक सन्ध्या-वन्दन, अग्निहोत्र, वैश्वदेव, बलि-वैश्व — गृहस्थ के obligatory daily rituals का authentic exposition।

डॉ. धर्मवीर विद्यावारिधि की scholarly contribution यह है कि उन्होंने theoretical अष्टाध्यायी-based understanding को practical purohita-guidance से bridge किया है। कौन-सा मन्त्र किस moment में recite करना है, उसका सम्यक् उच्चारण एवं intent (sankalpa) — यह सब practical detail systematically प्रस्तुत है।

समकालीन relevance पर भी विशेष विचार है — आधुनिक urban life में full-scale vedic ceremonies conduct करने की practical challenges, कैसे essential अंश retain किए जाएँ, कैसे young generation को ceremonies की importance समझाई जाए — यह sensitive contemporary issues भी addressed हैं।

180 पृष्ठीय focused आयाम specialised practitioners के लिए ideal है। Vedic purohits, karmakandins, गृह्य-कर्म-conductors, आर्य समाज के dharmic-कर्म-conductors, संस्कृत-कर्मकाण्ड-shastri के अभ्यर्थियों, वैदिक gurukulas, dharmic-गृहस्थों जो अपने रीति-रिवाजों को authentic तरीके से follow करना चाहते हैं, एवं प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो आश्वलायन गृह्य-परम्परा के practical dimensions को समझना चाहता है — आश्वलायनसूत्रप्रयोगदीपिका एक indispensable ग्रंथ है।

ग्रंथ का एक और उल्लेखनीय अंश आधुनिक तकनीकी युग में इन प्राचीन संस्कारों को कैसे meaningful ढंग से conduct किया जा सकता है, इस पर व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत करता है। डॉ. धर्मवीर विद्यावारिधि ने विशेष रूप से urban परिवारों के लिए संक्षिप्त किन्तु authentic संस्कार-विधियों का भी उल्लेख किया है, जो समय एवं संसाधन की सीमाओं के बावजूद shastric सत्यनिष्ठा बनाए रखती हैं। यह practical adaptability ग्रंथ को समकालीन गृहस्थों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक बनाती है। इसके साथ ही, ग्रंथ में विभिन्न क्षेत्रीय परम्पराओं में आश्वलायन-सूत्रों के प्रयोग में पाई जाने वाली minor variations का भी scholarly नोटिंग है — उत्तर भारत, दक्षिण भारत एवं पश्चिम भारत के purohit-समुदायों में कुछ practice-differences देखी जाती हैं, जिनका respectful acknowledgment डॉ. धर्मवीर विद्यावारिधि ने प्रस्तुत किया है। यह regional sensitivity ग्रंथ को pan-Indian audience के लिए व्यापक रूप से प्रासंगिक बनाती है, बिना किसी एक परम्परा को दूसरे से श्रेष्ठ बताए। डॉ. धर्मवीर विद्यावारिधि ने ग्रंथ के अंत में एक quick-reference checklist भी प्रदान की है, जो प्रत्येक संस्कार के लिए आवश्यक सामग्री एवं चरणों को संक्षेप में सूचीबद्ध करती है। यह practical tool उन purohitों एवं गृहस्थों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिन्हें किसी संस्कार की तैयारी शीघ्रता से करनी हो, बिना पूरे ग्रंथ को दोबारा पढ़े।

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