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Ashtottarashatanamavali (Sanskrit–Hindi) – by Vidyasagar Shastri | 108 Names Japa Sadhana

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अष्टोत्तरशतनामालिका, विद्वान् श्री विद्यासागर शास्त्री द्वारा रचित यह 233 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी ग्रंथ, वैदिक एवं शास्त्रीय परम्परा के 108 प्रतिष्ठित नामों-स्तोत्रों का scholarly संकलन एवं devotional-philosophical exposition प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति भारतीय dharmic परम्परा में ‘अष्टोत्तरशत’ (108) संख्या की civilisational महत्ता को scholarly तरीके से उद्घाटित करती है।

‘108’ — यह संख्या भारतीय आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परम्परा में एक अनुपम स्थान रखती है। जपमाला के 108 मणि, 108 उपनिषद्, 108 शिव-नाम, 108 विष्णु-नाम, 108 सूर्य-नमस्कार — इन सब में यह संख्या repeat होती है। गणितीय, खगोलीय एवं आध्यात्मिक — विविध scholarly reasons इसके पीछे हैं, जिनका ग्रंथ में विवेचन है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड वैदिक 108-नाम-परम्पराओं का scholarly परिचय प्रस्तुत करता है। ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा के 108 नाम — जो वेदों एवं उपनिषदों से चयनित हैं। प्रत्येक नाम का scholarly etymological analysis — क्यों यह नाम, क्या इसका shastric significance है।

‘सत्’ — ईश्वर का प्रथम नाम — का विवेचन ग्रंथ का प्रकाशमान बिन्दु है। छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1) — ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ — यह सूत्र सत्-तत्त्व की universal presence को रेखांकित करता है। ‘चित्’ (consciousness) एवं ‘आनन्द’ (bliss) का scholarly exposition भी प्रस्तुत है — तैत्तिरीय उपनिषद् का ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’।

अन्य important नामों — ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, राम, कृष्ण, शक्ति — इन सबका scholarly विवेचन। प्रत्येक नाम के साथ मूल Sanskrit spelling, देवनागरी में मुद्रण, etymological derivation, shastric reference, devotional significance एवं contemporary spiritual application प्रस्तुत है।

नाम-स्मरण की methodology का scholarly विवेचन भी ग्रंथ का अंग है — जप-योग की practice, माला का सम्यक् उपयोग, विभिन्न प्रकार के जप, mantric vibrations का psycho-spiritual प्रभाव। Bhakti-marga के साथ नाम-योग के संबंध का scholarly discussion भी है — भक्ति-परम्परा में नाम-कीर्तन का central place, नाम में एवं नामी में abheda-siddhanta।

आर्य समाज परम्परा के अनुरूप, लेखक ने यह scholarly clarification भी प्रस्तुत की है कि 108 नाम विभिन्न pluralistic देवताओं के नाम नहीं — अपितु एक ही परम-सत्ता के विभिन्न attribute-based descriptors हैं। ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ — यह Vedic principle नाम-plurality की सही scholarly interpretation है।

ग्रंथ के अंतिम अध्याय में 108 नामों की माला-format में presentation है, जो jap-practice के लिए convenient है। Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी format ग्रंथ को broad readership के लिए accessible बनाता है।

Sanskrit के विद्यार्थियों, dharmic-गृहस्थों, jap-साधकों, mantra-practitioners, आर्य समाज के साधकों, comparative religion के researchers, spiritual seekers, एवं प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो भारतीय ईश्वर-नाम-परम्परा की scholarly गहराई तक पहुँचना चाहता है — अष्टोत्तरशतनामालिका एक मूल्यवान संसाधन है।

ग्रंथ में यह भी दिखाया गया है कि किस प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों में यह 108-नाम-परम्परा प्रचलित है — शैव, वैष्णव, शाक्त, तथा वैदिक-आर्य समाज परम्परा — प्रत्येक की अपनी विशिष्ट 108-नाम-सूचियाँ हैं, जो एक ही civilisational आधार से उपजी विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। लेखक ने इस विविधता को respectful scholarly तरीके से प्रस्तुत करते हुए, अंततः वैदिक एकेश्वरवादी दृष्टिकोण की ओर पाठक को guide किया है, जो इन सभी नामों के मूल में निहित एकत्व को उद्घाटित करता है। इसके अतिरिक्त, ग्रंथ में विभिन्न आयु-वर्ग एवं जीवन-अवस्थाओं के अनुकूल जप-अभ्यास की व्यावहारिक सलाह भी दी गई है — बच्चों के लिए सरल नाम-स्मरण, युवाओं के लिए concentration-building अभ्यास, वृद्धों के लिए शान्ति-प्रदायक जप-विधियाँ। यह life-stage-sensitive approach ग्रंथ को केवल एक theoretical text से आगे, एक genuinely usable family spiritual companion बनाती है, जिसे विभिन्न पीढ़ियाँ अपनी-अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उपयोग कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त, ग्रंथ में प्रत्येक नाम के साथ एक-एक संक्षिप्त कथा अथवा शास्त्रीय संदर्भ भी जोड़ा गया है, जो नाम के भावार्थ को जीवन्त बनाता है और पाठक के लिए स्मरण को सरल करता है। यह storytelling-approach विशेष रूप से बच्चों एवं नए साधकों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है, जिन्हें अमूर्त दार्शनिक concepts से पहले concrete narrative-anchors की आवश्यकता होती है।

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