Vedic Books
New

Anasaktiyoga – Moksha Ki Pagdandi (Hindi) – by Jagannath Pathik | Gita Karma Yoga

200.00
25 people are viewing this right now
Estimated Delivery:
17 - 24 Jul, 2026
payment-processing
Guaranteed safe & secure checkout

Product details

अनासक्तियोग — मोक्ष की पगडंडी (Anasaktiyoga – Moksha Ki Pagdandi), विद्वान् श्री जगन्नाथ पथिक द्वारा रचित यह 300 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, श्रीमद्भगवद्गीता के केन्द्रीय सन्देश — अनासक्ति-कर्म-योग — का scholarly किन्तु सुलभ विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति, आधुनिक गृहस्थ-साधक के लिए मोक्ष-मार्ग की एक practical मार्गदर्शिका है, जो गीता के गूढ़ दर्शन को दैनिक जीवन में उतारने की scholarly पद्धति प्रस्तुत करती है।

‘अनासक्ति’ — गीता का यह foundational concept — भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का अनुपम contribution है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता 2.47) — कर्म पर तेरा अधिकार है, फल पर नहीं — यह श्रीकृष्ण का classical सूत्र अनासक्ति-कर्म-योग की मूल भूमि है। श्री पथिकजी ने इसी सूत्र को अपनी समस्त विवेचन-यात्रा का प्रस्थान-बिन्दु बनाया है।

ग्रंथ के प्रथम खण्ड में ‘आसक्ति’ एवं ‘अनासक्ति’ का दार्शनिक भेद scholarly तरीके से उद्घाटित किया गया है। आसक्ति वह मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति कर्म के फल से बँधा रहता है, अपेक्षाओं से grasped रहता है। इसके विपरीत अनासक्ति वह मुक्त-चित्त स्थिति है जिसमें व्यक्ति कर्म को पूर्ण निष्ठा से करता है, किन्तु फल के प्रति detached रहता है।

पथिकजी ने यह scholarly clarification भी प्रस्तुत की है कि अनासक्ति निष्क्रियता नहीं है। यह foundational मिस्अंडरस्टैंडिंग गीता के मूल संदेश के विरुद्ध है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है — ‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्’ (3.5) — क्षण-मात्र भी कोई अकर्म नहीं रह सकता। अनासक्ति कर्म-त्याग नहीं, अपितु फल-आसक्ति का त्याग है।

द्वितीय खण्ड में अनासक्ति-योग के व्यावहारिक aspects विवेचित हैं। गृहस्थ जीवन में — व्यवसाय, परिवार, सामाजिक responsibilities — इन सबमें अनासक्ति कैसे साधी जाए। स्वधर्म का पालन एवं फल की अनासक्ति — यह द्विविध साधना कैसे integrated हो। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (2.50) — कुशलता ही योग है — इस सूत्र का practical application।

समत्व-योग का scholarly विवेचन ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। ‘सुख-दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ (2.38) — इन द्वंद्वों में समता प्राप्त करने की साधना। यह समत्व केवल भावनात्मक stoicism नहीं — यह एक deep philosophical realisation है कि द्वंद्व-अनुभव स्वयं आत्म-अज्ञान से उत्पन्न होते हैं।

स्थित-प्रज्ञ के लक्षण — ‘प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्’ (2.55) — का detailed विवेचन ग्रंथ का एक प्रकाशमान खण्ड है। मन में उत्पन्न कामनाओं का त्याग, आत्मा में ही आत्म-तुष्टि, दुःख में उद्विग्न न होना, राग-भय-क्रोध से मुक्ति — यह स्थित-प्रज्ञ की परम स्थिति है, जो अनासक्ति-कर्म-योग का ultimate फल है।

पथिकजी ने ध्यान-योग एवं भक्ति-योग के साथ अनासक्ति-कर्म-योग के संबंध का scholarly discussion भी प्रस्तुत किया है। यह त्रिविध मार्ग परस्पर विरोधी नहीं — वे एक-दूसरे के पूरक हैं। कर्म बिना ज्ञान अंधा है, ज्ञान बिना कर्म खोखला है, दोनों बिना भक्ति निरस हैं — त्रिविध का scholarly संगम ही पूर्ण योग है।

आधुनिक काल में अनासक्ति-योग की प्रासंगिकता विशेष रूप से रेखांकित है। आज के तनाव-पूर्ण, competitive, result-obsessed जीवन में अनासक्ति-भावना एक mental health antidote है। corporate leaders, professionals, teachers, doctors, गृहणियाँ — सभी के लिए यह foundational साधना relevant है।

ग्रंथ की एक विशेषता है — गीता के सूत्रों की practical translation। प्रत्येक अनासक्ति-सम्बन्धी सूत्र को daily life के concrete situations में कैसे apply किया जाए, इसके illustrative examples ग्रंथ में मिलते हैं।

लेखक की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें संस्कृत गीता-सूत्रों का सटीक प्रयोग है। मूल सूत्र, हिन्दी अनुवाद, scholarly व्याख्या, एवं practical application — यह चतुर्विध संरचना अध्ययन को systematic बनाती है।

गीता-साधकों, वेदान्त के विद्यार्थियों, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, आधुनिक professionals, dharmic-गृहस्थों, आर्य समाज के साधकों, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो गीता के केन्द्रीय संदेश को daily जीवन में utaarna चाहता है — अनासक्तियोग: मोक्ष की पगडंडी एक trustworthy मार्गदर्शक है।

ग्रंथ की एक अतिरिक्त विशेषता यह है कि लेखक ने अनासक्ति-योग को केवल theoretical philosophy के रूप में नहीं, अपितु एक lived experience के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने अनेक ऐसे contemporary उदाहरण दिए हैं जहाँ साधकों ने अनासक्ति-भाव अपना कर अपने जीवन में significant transformation अनुभव किया। यह case-study-approach ग्रंथ को केवल शास्त्रीय व्याख्या से आगे practical spiritual manual बनाती है। साथ ही, गीता के अन्य प्रमुख सूत्रों — जैसे ‘त्रिविध कर्म’ (नियत, वैकारिक, तामसिक), ‘त्रिगुण-विभाग-योग’ — के साथ अनासक्ति के अन्तर्संबंध का भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

Enable Notifications OK No thanks