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संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास (दो भागों में) | Sanskrit Vyakaran Shastra ka Itihas (2 Volumes)

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Description

‘संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास’ भारतीय भाषिक-परम्परा, वैदिक वाङ्मय तथा शास्त्रीय चिन्तन के विकास को समझने के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ ग्रन्थ है। यह केवल व्याकरण का इतिहास प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परम्परा के क्रमिक विकास का दर्पण भी है। लेखक म॰ म॰ पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक ने दीर्घकालीन शोध, प्राचीन ग्रन्थों के गहन अध्ययन तथा ऐतिहासिक दृष्टि से सूक्ष्म विश्लेषण के आधार पर इस महाग्रन्थ की रचना की है।

संस्कृत व्याकरण भारतीय ज्ञान-परम्परा का मूल आधार माना जाता है। वेद, वेदाङ्ग, दर्शन, काव्य, पुराण, शास्त्र—इन सभी का अध्ययन व्याकरण की गहन समझ के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। इस दृष्टि से यह ग्रन्थ संस्कृत व्याकरण शास्त्र के इतिहास, विकास-क्रम, प्रमुख आचार्यों तथा उनकी व्याख्या-परम्पराओं का सम्यक् परिचय कराता है। इसमें पाणिनि से पूर्व के वैयाकरणों से लेकर उत्तरवर्ती परम्परा तक के अनेक विद्वानों का ऐतिहासिक एवं दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

इस ग्रन्थ का एक विशेष महत्व यह है कि इसमें भारतीय कालगणना-परम्परा के आधार पर विभिन्न आचार्यों के काल-निर्धारण का प्रयास किया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ केवल भाषिक अध्ययन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारतीय इतिहास-चिन्तन के एक वैकल्पिक दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत करता है। पाश्चात्य इतिहासलेखन के प्रभाव में जो अनेक भ्रान्त धारणाएँ संस्कृत व्याकरण और भारतीय बौद्धिक परम्परा के विषय में प्रचलित हुईं, उनका तार्किक एवं प्रमाणिक निराकरण भी इस कृति में किया गया है।

ग्रन्थ में व्याकरण शास्त्र के प्रमुख अंगों—धातुपाठ, उणादिसूत्र, परिभाषा-पाठ, लिङ्गानुशासन आदि—की परम्परा और उनके प्रवर्तकों का विस्तृत परिचय मिलता है। साथ ही व्याकरण को केवल भाषा-विज्ञान का उपकरण न मानकर एक दार्शनिक अनुशासन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस दृष्टि से यह कृति भारतीय दार्शनिक चिन्तन, भाषा-मीमांसा तथा वैदिक अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

यह ग्रन्थ विश्वविद्यालयों में व्याकरण शास्त्र एवं भारतीय बौद्धिक इतिहास के अध्ययन के लिए एक मानक सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में स्वीकृत रहा है। संस्कृत के शोधार्थियों, वेदाङ्ग के अध्येताओं तथा परम्परागत शास्त्र-अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्वानों के लिए यह एक अनिवार्य अध्ययन सामग्री के रूप में प्रतिष्ठित है।

भारतीय ज्ञान-परम्परा की जड़ों को समझने, व्याकरण की ऐतिहासिक यात्रा को जानने तथा संस्कृत साहित्य के व्यापक सन्दर्भ को आत्मसात करने के लिए यह द्विखण्डीय कृति अत्यन्त मूल्यवान सिद्ध होती है।

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