त्रिभाषी कोशः | Tribhashi Kosh – हिन्दी-संस्कृत-English त्रिभाषिक शब्दकोश

Description
“त्रिभाषी कोशः” भारतीय भाषिक अध्ययन, संस्कृत-अध्ययन तथा बहुभाषिक अनुवाद की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ है। इस ग्रंथ में हिन्दी (लोकभाषा), संस्कृत तथा अंग्रेज़ी—इन तीनों भाषाओं के प्रचलित शब्दों का सुव्यवस्थित संकलन प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक इन भाषाओं के बीच अर्थ-संबंध को सरलता से समझ सकें।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति, दर्शन और ज्ञान-संरक्षण का आधार माना गया है। संस्कृत को भारतीय भाषाओं का मूल स्रोत समझा जाता है, और अनेक भारतीय भाषाओं के शब्द-भंडार पर इसका गहरा प्रभाव रहा है। इसी कारण संस्कृत और आधुनिक भाषाओं के बीच सेतु-निर्माण हेतु शब्दकोशों की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यह त्रिभाषी कोश विशेष रूप से उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी के बीच अनुवाद करते समय कठिनाइयों का अनुभव करते हैं। इस ग्रंथ में लोकभाषा के प्रचलित शब्दों को आधार बनाकर उनके संस्कृत तथा अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्दों का संकलन किया गया है। इससे हिन्दीभाषी पाठक संस्कृत और अंग्रेज़ी के शब्द-ज्ञान को सहज रूप से अर्जित कर सकते हैं।
इस ग्रंथ की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसके परिशिष्ट हैं। प्रथम परिशिष्ट में “अनेकार्थध्वनिमञ्जरी” नामक नानार्थ-संग्रह प्रस्तुत किया गया है, जिससे शब्दों के बहुविध अर्थों को समझने में सहायता मिलती है। द्वितीय परिशिष्ट में उपसर्गों के अर्थ उदाहरण सहित दिए गए हैं, जिससे शब्द-निर्माण की प्रक्रिया और संस्कृत व्याकरण की मूल संरचना स्पष्ट होती है।
भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंध को समझने में इस प्रकार के बहुभाषिक कोश अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आधुनिक भाषाविज्ञान और शिक्षा-नीति में भी बहुभाषिक अध्ययन को भाषा-अधिगम का प्रभावी माध्यम माना जाता है, क्योंकि इससे भाषाई विविधता और ज्ञान-संचार दोनों का विकास होता है।
“त्रिभाषी कोशः” केवल एक शब्दकोश नहीं बल्कि भाषिक अध्ययन, संस्कृत-अध्ययन और अनुवाद-कौशल के विकास का एक उपयोगी साधन है। यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, अनुवादकों तथा पारंपरिक भारतीय ज्ञान-परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है।
इस प्रकार यह ग्रंथ भाषा-अध्ययन की व्यावहारिक आवश्यकता और भारतीय भाषिक विरासत के संरक्षण के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है, जिससे पाठक बहुभाषिक ज्ञान-संरचना को समझने में समर्थ हो सकते हैं।
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