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स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश | Swamantavyamantavyprakash

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Description

‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने अपने द्वारा स्वीकार किए गए प्रमुख सिद्धांतों का स्पष्ट और तर्कसंगत प्रतिपादन किया है। यह पुस्तक वैदिक विचारधारा के मूल तत्त्वों को समझने के लिए एक आधारभूत कृति के रूप में मानी जाती है। इसमें महर्षि दयानन्द ने उन इक्यावन सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है जिन्हें वे सार्वकालिक सत्य मानते थे और जिनके माध्यम से उन्होंने समाज को सत्य मार्ग की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया।

महर्षि दयानन्द का उद्देश्य किसी नए मत या पंथ की स्थापना करना नहीं था, बल्कि वेदों में निहित सार्वभौमिक सत्य को पुनः स्थापित करना था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका मन्तव्य वही है जिसे तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—में समान रूप से स्वीकार किया जा सके। इस दृष्टि से यह ग्रंथ वैदिक धर्म की सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता को दर्शाता है। यह पुस्तक इस बात पर भी बल देती है कि सत्य को स्वीकार करना और असत्य का त्याग करना ही वास्तविक धर्म है।

इस ग्रंथ में महर्षि दयानन्द ने धार्मिक, सामाजिक और दार्शनिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया कि धर्म का उद्देश्य मानव जीवन को उच्चतम आदर्शों की ओर ले जाना है। उन्होंने वेदों के आधार पर ईश्वर, आत्मा, कर्म, मोक्ष तथा समाज के संगठन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का विवेचन किया। इस प्रकार यह पुस्तक आर्यसमाज की स्थापना के पीछे की विचारधारा और उसके उद्देश्य को समझने का एक प्रमुख स्रोत है।

स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश केवल एक दार्शनिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण का भी एक माध्यम है। इसमें प्रस्तुत सिद्धांत व्यक्ति को विवेकशील बनाते हैं और उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के समन्वित मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। महर्षि दयानन्द का विश्वास था कि जब समाज सत्य और तर्क पर आधारित जीवन को अपनाएगा, तब ही वास्तविक प्रगति और समृद्धि संभव होगी। इस पुस्तक में उनकी यही दृष्टि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

यह ग्रंथ उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो आर्यसमाज के मूल सिद्धांतों, महर्षि दयानन्द के चिंतन और वैदिक धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहते हैं। साथ ही यह दार्शनिक अध्ययन, धार्मिक चिंतन और समाज सुधार से जुड़े विषयों में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है।

समग्र रूप से, ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ एक ऐसी कृति है जो पाठकों को सत्य की खोज, तर्कपूर्ण विचार और वैदिक जीवन मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है। यह पुस्तक महर्षि दयानन्द की वैचारिक धरोहर को समझने और आर्यसमाज की स्थापना के पीछे के उद्देश्य को जानने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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