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यजुर्वेद(Yajurveda)(स्वामी दयानंद सरस्वती)

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Description

चार वेदों में यजुर्वेद द्वितीय वेद है। कर्मकाण्‍ड प्रधान इस वेद में जहां यज्ञों और और यज्ञ के विधानों का वर्णन, वहीं ज्ञान-विज्ञान, आत्मा–परमात्‍मा तथा समाजोपयोगी सम्‍पूर्ण ज्ञान भी है। आर्यों की बुनियाद वेदों के ज्ञान पर टिकी है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि समय के साथ हर चीज़ बदलती है। लेकिन जो चीज़ नहीं बदलती वह है वेदों का ज्ञान जो स्वयं ईश्वर से प्रकट हुआ है। यजुष् एवं वेद शब्दों की संधि से यजुर्वेद बना है। यज् का अभिप्राय होता है समर्पण, हवन को भी यजन यानि की समर्पण की क्रिया कहते हैं। यजुष का अभिप्राय भी यज्ञ से लिया जाता है। जैसा कि इस वेद का नाम है इसी को सार्थक करते हुए इसमें हमें यज्ञ हवन के नियम व विधान मिलते हैं। पौराणिक कथाओं में अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय, अग्निहोत्र आदि अनेक यज्ञ करने, करवाने की कहानियां हैं। इन सब यज्ञों की विधि, इनसे संबंधित कर्मकांड यजुर्वेद में मिलते हैं। इस वेद में 40 अध्याय, 1975 मंत्र हैं। यजुर्वेद की दो शाखाएं शुक्ल यजुर्वेद व कृष्ण यजुर्वेद मिलती हैं।

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