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यजुर्वेद भाष्य | Yajurveda Bhashya – महर्षि दयानन्द सरस्वती

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Description

“यजुर्वेद भाष्य” महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक ग्रंथ है, जिसमें यजुर्वेद के मन्त्रों का प्रामाणिक अर्थ, पद-पदार्थ, भावार्थ तथा व्याकरण-सम्मत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। यह ग्रंथ उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो वेदों के वास्तविक अर्थ को समझना चाहते हैं और वैदिक ज्ञान को मूल स्वरूप में ग्रहण करना चाहते हैं।

यजुर्वेद चारों वेदों में से एक प्रमुख वेद है, जिसका संबंध मुख्यतः यज्ञ, श्रेष्ठ कर्म, सामाजिक अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन से है। वैदिक परंपरा में यजुर्वेद को कर्म-वेद कहा जाता है क्योंकि इसमें यज्ञीय क्रियाओं से संबंधित मन्त्रों और विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने भाष्य में वेदों के अर्थ को वैदिक भाषा और व्याकरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य वेदों में निहित सत्य ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाना था। उन्होंने मन्त्रों का निष्पक्ष और प्रमाणिक अनुवाद प्रस्तुत करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी भी शब्द का अर्थ मनमाने ढंग से न जोड़ा जाए और न ही मूल अर्थ को विकृत किया जाए।

इस संस्करण की विशेषता यह है कि इसमें सरल पाठ के साथ-साथ प्रत्येक मन्त्र का शब्दार्थ, अन्वय और भावार्थ भी दिया गया है। इससे पाठक केवल पाठ नहीं करते, बल्कि वेदों के दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश को भी समझ पाते हैं। यह ग्रंथ वैदिक अध्ययन, शोध, अध्यापन तथा स्वाध्याय के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

महर्षि दयानन्द का मानना था कि वेद सभी सत्य विद्याओं का मूल स्रोत हैं और मानव जीवन के आध्यात्मिक तथा नैतिक विकास के लिए उनका अध्ययन आवश्यक है। उनके भाष्य का उद्देश्य वेदों को अंधविश्वास या कर्मकाण्ड तक सीमित रखने के बजाय उन्हें ज्ञान और विवेक का आधार बनाना था।

यह पुस्तक विशेष रूप से विद्यार्थियों, वेद-अध्येताओं, शोधकर्ताओं तथा वैदिक जीवन-दर्शन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। इसके अध्ययन से पाठक यजुर्वेद के मन्त्रों के वास्तविक अर्थ को समझकर जीवन में धर्म, कर्म और ज्ञान का संतुलन स्थापित कर सकते हैं।

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