अथर्ववेद भाष्य | Atharvaveda Bhashya (Hindi–Sanskrit Commentary Edition)

Description
अथर्ववेद भारतीय वैदिक साहित्य की उस महत्वपूर्ण धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिक, सामाजिक, औषधीय तथा व्यवहारिक जीवन से संबंधित विविध ज्ञान का समन्वय मिलता है। प्रस्तुत “अथर्ववेद भाष्य” का यह सार-संक्षेप संस्करण वेदाध्ययन के इच्छुक साधकों, विद्यार्थियों तथा शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी रूप में तैयार किया गया है। इस ग्रंथ में अथर्ववेद के मन्त्रों को सरल पाठ, निष्पक्ष शब्दार्थ, भावार्थ और व्याकरण-सम्मत व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिससे वेद को मूल वैदिक भाषा-परंपरा के अनुरूप समझने का अवसर प्राप्त होता है।
इस संस्करण की विशेषता यह है कि इसमें प्रथम बार सन्धियों से मुक्त सरल पाठ दिया गया है, जिससे सामान्य पाठक भी शुद्ध उच्चारण के साथ वेद-मन्त्रों का अभ्यास कर सकता है। वैदिक परंपरा में मन्त्र-पाठ का महत्व केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मानसिक अनुशासन, विचार-शुद्धि और जीवन-दृष्टि के विकास का भी माध्यम रहा है। इस भाष्य में प्रत्येक शब्द का प्रमाण-आधारित अर्थ दिया गया है, जिससे वेद-विवेचन में प्रचलित भ्रमों का निराकरण होता है और वैदिक ज्ञान के यथार्थ स्वरूप का बोध संभव होता है।
अथर्ववेद को वैदिक ज्ञान की उस शाखा के रूप में भी देखा जाता है जिसमें लोकजीवन से जुड़े विषयों—स्वास्थ्य, प्रकृति, सामाजिक संतुलन तथा आध्यात्मिक अनुशासन—का समन्वित दृष्टिकोण मिलता है। वैदिक ऋषियों ने ज्ञान को केवल दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवनोपयोगी सत्य के रूप में प्रस्तुत किया। इस दृष्टि से यह भाष्य पाठकों को वेद के आध्यात्मिक तत्वों के साथ-साथ उसके व्यवहारिक पक्ष को भी समझने में सहायक सिद्ध होता है।
यह ग्रंथ विशेष रूप से उन अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो वैदिक साहित्य का अध्ययन मूल स्रोतों के आधार पर करना चाहते हैं। सरल अनुवाद और विस्तृत व्याख्या के कारण यह पुस्तक आरंभिक स्तर के पाठकों से लेकर उन्नत शोधकर्ताओं तक सभी के लिए उपयोगी बन जाती है। वैदिक अध्ययन की परंपरा में भाष्य-ग्रंथों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि वे मूल मन्त्रों के गूढ़ अर्थ को युगानुकूल भाषा में स्पष्ट करते हैं।
इस प्रकार “अथर्ववेद भाष्य” केवल एक भाष्य-ग्रंथ नहीं, बल्कि वैदिक ज्ञान परंपरा के पुनर्पाठ और पुनराविष्कार का माध्यम है। यह पाठक को वैदिक चिंतन की गहराई से परिचित कराते हुए आध्यात्मिक दृष्टि, बौद्धिक स्पष्टता और सांस्कृतिक चेतना का विकास करता है।
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