पुरुषार्थ-प्रकाशः (Purusharth-Prakasha) | The Philosophy of Human Goals in Vedic Thought

Description
भारतीय दार्शनिक परंपरा में पुरुषार्थ का सिद्धान्त मानव जीवन के समग्र उद्देश्य को समझाने वाला एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आधार है। “पुरुषार्थ-प्रकाशः” इसी शाश्वत सिद्धान्त को स्पष्ट करने वाला एक गंभीर आध्यात्मिक-दार्शनिक ग्रन्थ है, जिसमें जीवन के चार मुख्य लक्ष्यों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – के वास्तविक स्वरूप का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
वैदिक दृष्टि में मनुष्य केवल भौतिक अस्तित्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का वाहक है। इसी कारण भारतीय दर्शन ने जीवन के उद्देश्यों को केवल सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक समन्वय के रूप में देखा। पुरुषार्थ-तत्व इसी संतुलन का सिद्धान्त है, जो जीवन को एक समग्र दिशा प्रदान करता है।
इस ग्रन्थ में यह प्रतिपादित किया गया है कि धर्म जीवन का आधार है, अर्थ और काम उसके साधन हैं तथा मोक्ष उसका परम लक्ष्य है। वैदिक परंपरा में धर्म केवल धार्मिक कर्मकाण्ड का नाम नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और कर्तव्यनिष्ठ जीवन का मार्ग है। अर्थ को जीवन के आवश्यक संसाधनों की प्राप्ति का साधन माना गया है, जबकि काम मानव की स्वाभाविक इच्छाओं का नियंत्रित एवं संतुलित उपभोग है। इन तीनों का संतुलन अंततः आत्मोन्नति और मोक्ष की ओर ले जाता है।
यह पुस्तक वैदिक ग्रन्थों, उपनिषदों और आर्ष दर्शन की पृष्ठभूमि में पुरुषार्थ सिद्धान्त का विश्लेषण करती है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन की समृद्धि केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आन्तरिक शुद्धता और आत्मज्ञान से प्राप्त होती है। इस दृष्टि से यह ग्रन्थ केवल दार्शनिक चर्चा नहीं, बल्कि जीवन-मार्गदर्शन का साधन भी है।
दार्शनिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं तथा आर्यसमाज परंपरा के अनुयायियों के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है। जीवन के उद्देश्य को समझने की जिज्ञासा रखने वाले प्रत्येक गंभीर पाठक के लिए यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान करती है।
भारतीय संस्कृति की संतुलित जीवनदृष्टि को समझने हेतु पुरुषार्थ सिद्धान्त का अध्ययन अनिवार्य माना जाता है, और यह पुस्तक उसी अध्ययन को सरल, प्रामाणिक एवं विचारोत्तेजक रूप में प्रस्तुत करती है।
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